कोविड वैक्सीन के कारण क्यों बनते हैं ख़ून के थक्के, वैज्ञानिकों ने बताई वजह

ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राज़ेनेका कोविड वैक्सीन

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    • Author, जेम्स गैलाघर
    • पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता

वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें उस वजह का पता लगा है जिसके कारण ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राज़ेनेका कोविड वैक्सीन लगाने वालों के शरीर में दुर्लभ ब्लड क्लॉट्स यानी रक्त के थक्के बन जाते हैं.

वेल्स की राजधानी कार्डिफ़ और अमेरिका में एक टीम ने विस्तार में ये दिखाया है कि कैसे ख़ून में मौजूद एक प्रोटीन वैक्सीन के एक प्रमुख घटक की ओर आकर्षित होता है.

उन्हें लगता है कि ये एक तरह चेन रिएक्शन शुरू करता है जिसमें शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली भी शामिल होती है और फिर ख़ून के ख़तरनाक थक्के बन जाते हैं.

ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राज़ेनेका की कोविड वैक्सीन देने के बाद ख़ून के थक्के जमने के मामले सामने आए थे जिसके बाद वैक्सीन के इस्तेमाल को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी. साथ ही थक्के जमने के कारणों और उसके निदान को लेकर भी वैज्ञानिकों ने खोज शूरू कर दी थी. इस खोज के लिए कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी की टीम को आपातकालीन सरकारी फंड दिया गया था.

टीम के शुरुआती नतीज़ों के प्रकाशित होने के बाद एस्ट्राज़ेनेका के वैज्ञानिक भी इस शोध में शामिल हुए.

एस्ट्राज़ेनेका की प्रवक्ता ने ज़ोर देते हुए कहा वैक्सीन के मुक़ाबले कोविड संक्रमण के कारण थक्के जमने की ज़्यादा आशंका है. लेकिन, ऐसा क्यों होता है ये साफ़तौर पर अभी नहीं कहा जा सकता है.

प्रवक्ता ने कहा, "हालांकि, शोध अभी पूरा नहीं हुआ है लेकिन इससे दिलचस्प बातें पता चली हैं और एस्ट्राज़ेनेका इस दुर्लभ साइड इफेक्ट को ख़त्म करने के लिए इन निष्कर्षों से मदद लेने के तरीक़े तलाश रहा है."

ऑक्सफ़र्ड-एस्ट्राजेनिका कोविड वैक्सीन में दिए जाने वाले एडेनोवायरस की विस्तृत तस्वीर जो कि 100 नैनोमीटर से कम है.

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इन दुर्लभ रक्त के थक्कों की जांच कर रहे शोधकर्ताओं को दो शुरुआती सुराग मिले हैं.

  • थक्कों का ज़्यादा जोख़िम सिर्फ़ कुछ वैक्सीन तकनीकों के साथ देखा गया था.
  • जिन लोगों में थक्के पाए गए हैं उनमें असामान्य एंटीबॉडी थीं जो उनके रक्त में एक प्रोटीन पर हमला कर रही थीं जिसे प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर कहा जाता है.
वायरस

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एडेनोवायरस की भूमिका

ब्रिटेन में इस्तेमाल की जाने वालीं सभी कोविड वैक्सीन शरीर में कोरोना वायरस के आनुवंशिक कोड का एक छोटा-सा हिस्सा डालती हैं ताकि शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार हो सके.

एस्ट्राज़ेनेका ने आनुवंशिक कोड के लिए एडेनोवायरस (खासतौर पर चिंपांजी में पाया जाने वाला एक कॉमन कोल्ड वायरस) का उपयोग किया था.

शोधकर्ताओं का मानना है कि एडेनोवायरस को कुछ लोगों में होने वाले इन दुर्लभ ख़ून के थक्कों से जोड़कर देखा जा सकता है. इसका पता लगाने के लिए उन्होंने अणु जितने सूक्ष्म स्तर पर एडेनोवायरस की तस्वीर लेने के लिए क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी नामक एक तकनीक का उपयोग किया.

साइंस एडवांसेस नाम की एक पत्रिका में प्रकाशित उनके अध्ययन से पता चलता है कि एडेनोवायरस की बाहरी सतह प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर प्रोटीन को चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित करती है.

कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता प्रोफ़ेसर एलन पार्कर ने बीबीसी को बताया, "एडेनोवायरस की सतह बेहद नकारात्मक होती है और प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर बेहद सकारात्मक होता है और ऐसे में दोनों एकसाथ फिट बैठते हैं."

उन्होंने कहा, "हम एडेनोवायरस की बाहरी परत और प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर के बीच की कड़ी को साबित करने में सक्षम हुए हैं. हमारे पास अब ख़ून के थक्के जमने का कारण है लेकिन इसके बाद के भी कई चरण हैं."

ख़ून के थक्के

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आगे क्या होता है?

शोधकर्ताओं को लगता है कि अगला चरण "रोग प्रतिरक्षा तंत्र के ग़लत जगह काम करने" का है लेकिन इसकी पुष्टि के लिए और शोध करने की ज़रूरत है.

ये माना गया है कि प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर का बाहरी सतह पर एडेनोवायरस से चिपके होने के कारण शरीर ग़लती से प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर पर हमला करना शुरू कर देता है. इससे ख़ून में एंटीबॉडी आ जाती हैं जो प्लेटलेट फैक्टर फ़ोर के साथ जुड़ जाती हैं और ख़तरनाक ख़ून के थक्कों का निर्माण करना शुरू कर देती हैं.

वैक्सीन के कारण बने इन थक्कों को इम्यून थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिक कहा जाता है जिनके चलते ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन दिए जाने के बाद पांच करोड़ लोगों में से 73 की मौत हुई थी.

प्रोफ़ेसर पार्कर कहते हैं, "ये नहीं कहा जा सकता था कि ऐसा हर किसी के साथ होगा और इसकी आशंका भी बहुत कम होती है. इसलिए हमें ये देखना चाहिए कि वैक्सीन ने कितने ज़्यादा लोगों की जान बचाई है."

एस्ट्राज़ेनेका ने कहा कि माना जाता है कि वैक्सीन ने दुनिया भर में एक करोड़ से ज़्यादा ज़िंदगियां बचाई हैं और पांच करोड़ से ज़्यादा मामलों में कोरोना संक्रमण के ख़तरो को रोका है.

वैक्सीन

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ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी ने इस शोध पर कोई बयान देने से इनकार किया है.

यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स बर्मिंघम एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट में कंसल्टेंट हेमाटोलोजिस्ट डॉक्टर विल लेस्टर ने "विस्तार से किए गए" शोध की सराहना की और कहा कि इससे ख़ून के थक्के जमने के "संभावित शुरुआती चरण" को समझने में मदद मिलती है.

उन्होंने कहा, "अब भी कई सवालों के जवाब बाकी हैं. जैसे क्या कुछ लोग ख़ून के थक्के जमने को लेकर दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं और दिमाग की नसों व लीवर में ही ख़ून के थक्के क्यों जमते हैं. लेकिन ये और शोध के साथ पता चलेगा."

कार्डिफ़ की टीम को उम्मीद है कि उनके शोध से एडेनोवायरस आधारित वैक्सीन में और सुधार में मदद मिल सकती है ताकि वैक्सीन के किसी तरह के रिएक्शन के ख़तरे को कम किया जा सके.

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