कोरोना वैक्सीन आने के बाद क्या सब कुछ सामान्य हो जाएगा?

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- Author, जेम्स गैलघर
- पदनाम, स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
अगर आपको लगता है कि कोरोना की वैक्सीन आने के बाद सब कुछ एकदम से सामान्य हो जाएगा, तो शायद आपका सोचना ग़लत हो सकता है. प्रमुख वैज्ञानिकों ने इसे लेकर चेतावनी दी है.
वैक्सीन को एक ऐसे उपाय के रूप में देखा जा रहा है, जिसके आते ही महामारी समाप्त हो जाएगी. लेकिन रॉयल सोसायटी के शोधकर्ताओं ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि टीके से क्या होगा और क्या हो सकता है, इसे लेकर हमें तार्किक और व्यावहारिक होने की ज़रूरत है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि टीका जब भी आए, उसे लोगों तक ले जाने में कम से कम एक साल तक का समय लग सकता है. ऐसे में आवश्यकता है कि कोरोना वायरस के कारण जिन प्रतिबंधों को लागू किया गया है, उन्हें धीरे-धीरे हटाया जाए.
वैक्सीन को लेकर चल रहे प्रयोगों की बात करें, तो दुनियाभर में क़रीब 200 वैक्सीन प्रोजेक्ट चल रहे हैं. कई प्रारंभिक दौर में हैं, तो कई क्लीनिकल ट्रायल के लिए तैयार हैं.
इंपीरियल कॉलेज लंदन के नेशनल हार्ट एंड लंग इंस्टीट्यूट के डॉ. फ़ियोना कुली के मुताबिक़, "वैक्सीन के बारे में जानकर हमारे मन में उम्मीद पैदा होती है कि महामारी समाप्त हो जाएगी लेकिन हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि वैक्सीन के विकास में कई बार विफलता का मुँह देखना पड़ा है."
ब्रिटेन सरकार के वैज्ञानिक सलाहकारों समेत तमाम लोगों को उम्मीद है कि इस साल के अंत तक टीका तैयार कर लिया जाएगा और इसके बाद बड़े पैमाने पर टेस्ट किए जा सकेंगे.
लेकिन वहीं दूसरी ओर रॉयल सोसायटी ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यह एक लंबी प्रक्रिया होगी.
इंपीरियल कॉलेज लंदन में केमिकल इंजीनियरिंग के प्रमुख प्रोफ़ेसर निलय शाह का कहना है, "अगर वैक्सीन उपलब्ध हो भी जाती है, तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि एक महीने के भीतर ही हर किसी को टीका लग जाएगा. इसमें छह महीने भी लग सकते हैं. नौ महीने भी और शायद एक साल भी."
"इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि मार्च तक जन-जीवन अचानक से बिल्कुल पहले की तरह सामान्य हो जाएगा."
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दिशा में अब भी कई चुनौतियाँ हैं.
हालाँकि कुछ प्रायोगिक तरीक़ों को अपनाया जा रहा है. जैसे कि बड़े पैमाने पर आरएनए टीके बनाए जा रहे हैं, जो इससे पहले कभी नहीं किया गया था.
लेकिन चुनौतियाँ और भी हैं.

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जैसे वैक्सीन बनाने के लिए कच्चे माल की ज़रूरत. ना सिर्फ़ वैक्सीन के लिए बल्कि काँच की शीशियों के साथ-साथ रेफ्ऱिजरेटर की क्षमता भी एक चुनौती है. दरअसल कुछ वैक्सीन को माइनस 80 डिग्री सेल्सियस में रखने की ज़रूरत होती है.
प्रोफ़ेसर शाह का अनुमान है कि वार्षिक तौर पर सामान्य फ़्लू से निपटने के लिए हम जिस तरह क़दम उठाते हैं, कोरोना से निपटने के लिए उसके दस गुना तेज़ गति से काम करने की ज़रूरत होगी. साथ ही इसके लिए क़रीब 30 हज़ार ट्रेंड स्टाफ़ की भी आवश्यकता होगी.
वो कहते हैं, "मुझे इस बात की चिंता है कि क्या इस सबके बारे में गंभीरता से सोचा जा रहा है?"
कई वैक्सीन के प्रारंभिक परीक्षण से पता चला है कि उनके इस्तेमाल से रोग प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया तेज़ हुई, लेकिन किसी अध्ययन में अभी यह सामने नहीं आया है कि यह पूर्ण सुरक्षित है और इससे कोविड-19 के लक्षण कम होंगे.
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कई सवालों के अब तक नहीं मिले जवाब
इंपीरियल कॉलेज लंदन में इम्यूनोलॉज़ी के प्रमुख प्रोफ़ेसर चार्ल्स बांगम का कहना है, "हम वाकई ये नहीं जानते हैं कि कोई टीका कब तक तैयार हो जाएगा, यह भी नहीं जानते कि यह कितना प्रभावी होगा और ना तो यही बता सकते हैं कि यह कब तक हर किसी को उपलब्ध हो सकेगा."
वो आगे कहते हैं, "अगर यह प्रभावी हुआ भी, तो इस बात की संभावना कम है कि तुरंत ही सब कुछ पहले की तरह हो जाएगा."
वहीं दूसरी ओर वैक्सीन से जुड़े ही कई अन्य सवाल अब भी अनुत्तरित हैं.
- क्या एक शॉट पर्याप्त होगा या फिर बूस्टर की ज़रूरत पड़ेगी? क्या यह वैक्सीन हर साल-दो साल के अंतराल पर लेनी होगी?
- क्या कोई वैक्सीन बुज़ुर्ग लोगों पर भी उतने ही कारगर तरीक़े से काम करेगी?
- वैक्सीन लगने के कितने दिनों तक उसका असर बना रहेगा?
अध्ययन पर टिप्पणी करते हुए बाथ यूनिवर्सिटी के डॉ. एंड्रयू प्रेस्टन कहते हैं, "वैक्सीन को एक ऐसे अचूक उपाय के तौर पर चित्रित किया जा रहा है, जो आते ही महामारी को दूर कर देगी लेकिन यह समझने की ज़रूरत है कि इसके असर में वक़्त लगेगा."
उनका कहना है कि इस बात पर चर्चा किए जाने की ज़रूरत है कि क्या देश में आने वाले लोगों के लिए टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए वैक्सीन पासपोर्ट की आवश्यकता है.
वो इस बात पर भी रोशनी डालते हैं कि लोगों में वैक्सीन को लेकर झिझक भी बढ़ रही है.
वो सवाल करते हैं कि क्या होगा अगर कोई शख़्स अपनी पार्टनर को टीके के लिए मना कर देगा, तो क्या हम उन्हें दूसरों के लिए ख़तरा बनने को छोड़ देंगे या फिर स्कूल जाने वाले हर बच्चे के लिए इसे अनिवार्य कर दिया जाएगा.
वो कहते हैं कि ऐसे बहुत से कठिन और उलझन भरे सवाल हैं, जिनका अब भी कोई जवाब नहीं है.
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