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रविवार, 24 मई, 2009 को 15:04 GMT तक के समाचार
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'जोड़-तोड़ वाला गठबंधन भूल थी'
सीताराम येचुरी, करात
लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद करात पर काफ़ी दबाव है
चुनाव से पहले बने तीसरे मोर्चे में शामिल बहुजन समाज पार्टी, जनता दल(एस) और तेलंगाना राष्ट्री समिति (टीआरएस) के चुनाव बाद तीसरे मोर्चा का दामन छोड़ यूपीए और एनडीए की तरफ़ झुकते देखकर मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी ख़ासी नाराज़ है.

एक निजी टीवी चैनल के साथ बातचीत में पार्टी के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने तो यहाँ तक कहा कि 'जोड़-तोड़' वाला गठबंधन बनाना एक बड़ी भूल थी.

सीताराम येचुरी ने कहा, "मैं ये कहना चाहता हूँ कि जिस तरह से मोर्चे के घटक दल गठबंधन तोड़ रहे हैं उससे ये बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि ये एक भूल थी."

येचुरी ने कहा, "हमने पाया कि बसपा और जद(एस) पहले भी भाजपा के साथ रही हैं जिसके चलते मतदाताओं ने तीसरे मोर्चे को विश्वसनीय नहीं माना."

पार्टी की हार के बाद क्या प्रकाश करात पर इस्तीफ़ा देने का दबाव है, इस सवाल पर येचुरी ने कहा कि हार के कारणों पर विचार करने के लिए पार्टी की केंद्रीय समिति की जून में बैठक होगी लेकिन करात को पद से हटाने का मतलब ज़िम्मेदारी से भागना होगा.

उन्होंने कहा कि सीपीआई(एम) सामूहिक कार्य और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी के सिद्धांत पर चलने वाली पार्टी है. अगर पार्टी हारती है तो इसकी ज़िम्मेदीरा सब की होती है ना कि किसी एक व्यक्ति विशेष की.

पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद पार्टी पर ज़मीनी हक़ीक़तों से नाता तोड़ने पर आलोचना कर रहे हैं. इस पर येचुरी ने कहा, "हम सभी मुद्दों पर बात करेंगे और आत्मविश्लेषण करके निर्णय लेंगे."

 हमने पाया कि बसपा और जद(एस) पूर्व में भाजपा के साथ रही हैं जिसके चलते मतदाता ने तीसरे मोर्चे को विश्वसनीय नहीं माना
सीताराम येचुरी

पिछले 20 वर्षों में ये पहली बार है जब पार्टी का केंद्र में बनने वाली धर्मनिरपेक्ष सरकार में कोई किरदार नहीं है.

माकपा को 1967 में 19 सीटें मिली थीं जबकि इस चुनाव में उसके केवल 16 सदस्य ही लोकसभा पहुँच पाए हैं.

येचुरी ने कहा कि तीसरे मोर्चे का मक़सद राजनैतिक ढर्रे को बदलना है जिसके लिए प्रतिबद्धता की ज़रूरत है और इसका कोई ‘संक्षिप्त रास्ता’ नहीं है.

क्या मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से मतादाता तीसरे मोर्चे से दूर रहे तो इस पर येचुरी ने कहा कि लोगों के लिए स्थायित्व अकेला मुद्दा नहीं था वे एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक बुनियाद की वचनबद्धता चाहते थे.

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