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कहीं 'दीवार' और कहीं ये सी-ग्रेड फ़िल्म जैसे डायलॉग.. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऑल टाइम ग्रेट हिंदी फ़िल्मों की सूची बनेगी तो कम से कम मैं उसमें अमिताभ बच्चन की 'दीवार' अवश्य शामिल करूँगा और ‘दीवार’ की लोकप्रियता का एक कारण उसके ज़बरदस्त डॉयलाग भी थे. फ़िल्म में यूँ तो कई यादगार डॉयलाग हैं, पर जैसे 'शोले' की याद आते ही “अरे ओ सांभा” का ध्यान आता है, वैसे ही ‘दीवार’ की बात चलते ही मुझे अमिताभ और शशि कपूर के बीच पुल के नीचे हुई उस डॉयलागबाज़ी का सिलसिला याद आता है, जिसमें शशि कपूर अमिताभ को ये कहकर जैसे निरुत्तर कर देते हैं कि “मेरे पास माँ है.” महानायक अमिताभ बच्चन की कई कामयाब फ़िल्मों में एक मज़बूत माँ का किरदार काफ़ी ‘सेंट्रल’ होता था (त्रिशूल, शक्ति इत्यादी) और इस सिलसिले का आरंभ भी शायद ‘दीवार’ फ़िल्म के साथ हुआ था. मेनका-माया संवाद ‘दीवार’ फ़िल्म के इस डायलाग का पिछले सप्ताह मेनका गांधी और मायावती में चलने वाले वाकयुद्ध से कोई कनेक्शन नहीं है, पर न जाने क्यूँ जितनी बार इन दोनों ने "मैं हूँ असली और बड़ी माँ” का दाँव चला, मुझे ‘दीवार’ की याद ताज़ा हो गई. लेकिन ‘दीवार’ में एक तरह का आनंद था. लगा था एक 'क्लासिक' देख रहे हैं. मुँह से अनायास ही जैसे कई बार वाह-वाह की तर्ज़ पर दाद निकल जाती थी. मेनका-मायावती प्रकरण उसके मुक़ाबले किसी बी-ग्रेड फ़िल्म जैसा लगा. मेनका गांधी का यह कहना कि मायावती किसी माँ की पीड़ा क्या समझेंगी, कोई बहुत अच्छे अंदाज़ में की गई टिप्पणी नहीं लगी. अंग्रेज़ी जुमले का इस्तेमाल करें तो कुछ ‘ बिलो द बैल्ट’ बात लगी. मायावती की पहली प्रतिक्रिया तो जैसे, नहले पर दहला थी.
उनका कहना था कि वह केवल एक बच्चे की नहीं स्वयं को वरुण जैसे सैकड़ों-हज़ारों युवाओं की माँ समझती हैं. उनका आगे दिया गया बयान --अगर मेनका वरुण को सही संस्कार देतीं तो वह शायद जेल में नहीं होते --कुछ हल्का तो लगा लेकिन चुनावी गर्मी के दौरान मेनका ने उनके ‘माँ’ नहीं होने को मुद्दा बनाया था, इसलिए उसे शायद नज़रअंदाज़ किया जा सकता था. सी-ग्रेड फ़िल्म पर हद तो तब हो गई जब मायावती ने स्वयं की मदर टेरेसा से तुलना करने की कोशिश की और कहा कि मदर भी तो माँ नहीं थीं लेकिन कितने लाखों लोगों की पीड़ा न सिर्फ़ समझती थीं, उसे दूर भी करने की कोशिश करती थीं. फिर मेनका का जवाब आया कि मदर टेरेसा अपनी वर्षगांठ पर जबरन चंदा वसूली नहीं करती थीं और इंजीनियर्स का ख़ून नहीं करवाती थीं. अब तक मेनका बनाम मायावती यह एपिसोड बी-ग्रेड भी नहीं, किसी सी-ग्रेड फ़िल्म में से उठाया हुआ सीन लगने लगा था. सच, भारतीय नेता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी पर्व पर किस तरह का उदाहरण पेश करना चाहते हैं? क्या इस स्तर के वाकयुद्ध में उलझ कर वह सोच सकते हैं कि अच्छे लोग राजनीति में आएँगे और नेताओं की इज़्ज़त करेंगे? अच्छा हो कि इन नेताओं के भाषण और बयानों का ज़िम्मा किसी फ़िल्म लेखक को ही दे दिया जाए. मनोरंजन कुछ ज़्यादा स्वस्थ होगा और स्तर भी कुछ बेहतर. क्योंकि इन फ़िल्म लेखकों को सेंसर की क़ैंची का कुछ लिहाज़ और डर तो होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें खरी खरीः चरम पर है राजनीतिक अवसरवाद04 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस मार्क टली के साथ एक मुलाक़ात05 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस 'राजनीति के 60 बरस में आठ बरस थी सत्ता'02 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस खरी-खरी: असहमत पाठकों से रू-ब-रू31 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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