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शुक्रवार, 23 जनवरी, 2009 को 14:41 GMT तक के समाचार
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'हम लड़ें... पर एक साथ, आतंकवाद से'

भारत-पाकिस्तान की सीमा
मुंबई में दो महीने पहले हुए हमलों के बाद दोनों देशों के बीच शांति प्रयासों को धक्का लगा है

हम आपके यहाँ मुंबई हमलों से दुखी हैं पर हमारी भी स्थिति समझिए, हम रोज़ मुंबई झेल रहे हैं. रोज़ लोग मारे जा रहे हैं...हमें इस स्थिति से निबटने में आप सबका साथ चाहिए.... कहते कहते पाकिस्तान के सांसद मोहम्मद अदीक का गला भर-सा आता है. चेहरा तनाव और दर्द की टीस को छिपा नहीं पाता.

इन दिनों दिल्ली में पाकिस्तान से एक प्रतिनिधिमंडल आया हुआ है. प्रतिनिधिमंडल दोनों मुल्कों के बीच तनाव की सख़्त ज़मीन पर अमन की चंद बौछारें डालने की कोशिश कर रहा है.

20 से ज़्यादा लोगों के इस प्रतिनिधिमंडल में मानवाधिकार कार्यकर्ता, पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से कुछ सांसद, समाजसेवी, समाचार माध्यमों के संपादक, पत्रकार, अध्यापक जैसे लोग शामिल हैं.

प्रतिनिधिमंडल दोनों देशों के बीच 26 नवंबर के हमलों के बाद पैदा हुई तनाव की स्थिति को कम करने और अमन की कमज़ोर पड़ती लौ को कुछ ताकत देने आए हैं.

 हमारे इतिहास को तो आप चरमपंथ और ताज़ा स्थितियों के लिए दोषी ठहरा सकते हैं. पर वर्तमान सरकार को इसके लिए पूरी तरह से दोषी ठहरा देना उचित नहीं है. वर्तमान सरकार यह सब तब झेल रही है जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है
इम्तियाज़ आलम, निदेशक- साफ़्मा

दिल्ली में भारत सरकार के कुछ आला अधिकारियों के अलावा प्रतिनिधिमंडल ने पत्रकारों, शिक्षकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, छात्रों, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं और प्रतिनिधियों से भी बातचीत की.

प्रतिनिधिमंडल में शामिल पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की प्रमुख असमा जहांगीर ने बताया कि सियासी टकरावों में सबसे ज़्यादा असर आम लोगों पर पड़ता है. जो अमन चाहते हैं और बेहतर ताल्लुकात चाहते हैं. ऐसे में प्रतिनिधिमंडल तनाव के माहौल में अमन को बनाए रखने का संदेश लेकर आया है.

पाकिस्तान और आतंकवाद

प्रतिनिधिमंडल अमन की बात कहता आया है पर सवाल हर ओर से पाकिस्तान की ज़मीन पर चल रही चरमपंथी गतिविधियों के लिए उठते रहे.

हालांकि भारत के कई पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि मुंबई में हुए हमले दरअसल, एक बड़ी समस्या का चेहरा हैं. इस समस्या से पाकिस्तान की सरकार अकेले नहीं जूझ सकती है.

पर बार-बार सवाल उठे कि आखिर क्या वजहें हैं कि पाकिस्तान की सेना या सरकारें चरमपंथ से निपट पाने में नाकाम रही हैं.

इसपर पाकिस्तान से आए वरिष्ठ पत्रकार आईए रहमान ने कहा, “एक लंबे अरसे के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना हुई है. अलग-अलग राज्यों में अलग अलग पार्टियों का प्रभाव बना है. सैनिक शासन के बाद अभी इस सरकार को साल भी पूरा नहीं हुआ है. फिर चरमपंथ की ताज़ा स्थिति से एक दिन में नहीं निपटा जा सकता.”

भारत-पाकिस्तान के झंडे
प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि वे तनाव के माहौल में अमन का पैग़ाम लाए हैं

तो क्या राजनीतिक दल या सरकारों के पास चरमपंथ की समस्या से निपटने के लिए ज़रूरी गंभीरता और नीति की कमी है या सेना और सरकार का क़द पाकिस्तानी चरमपंथ के आगे घुटने टेकने जैसी हालत में हैं.

इसपर दक्षिण एशिया फ़्री मीडिया एसोसिएशन (साफ़्मा) के निदेशक इम्तियाज़ आलम कहते हैं, “हमारे इतिहास को तो आप चरमपंथ और ताज़ा स्थितियों के लिए दोषी ठहरा सकते हैं. पर वर्तमान सरकार को इसके लिए पूरी तरह से दोषी ठहरा देना उचित नहीं है. वर्तमान सरकार यह सब तब झेल रही है जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है.”

वो कहते हैं, "सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और नेताओं ने पिछले दिनों में जिस एक बात पर गंभीरता से बयान दिए हैं, वो चरमपंथ है. सबको दिख रहा है कि अब इससे निपटना होगा ही. पाकिस्तान के हालात अंदरूनी तौर पर इसी के चलते सबसे ज़्यादा बिगड़े हैं. देर से ही पर नेताओं ने इसे गंभीरता से देखना शुरू किया है."

हालांकि सवाल यह भी उठा कि दक्षिण एशिया की ताज़ा गतिविधियों के चलते भी तनाव को बढ़ावा मिला है. जिस सरकार को अपनी बाकी ज़रूरतों पर खर्च बढ़ाना चाहिए, वो भारत से होड़ करके सैनिक खर्च पर ही ध्यान दे रही है और इसके लिए उसके पास पर्याप्त राजनीतिक वजह भी है.

मसलन, भारत का परमाणु शक्ति संपन्न होना, अमरीका से परमाणु क़रार, शस्त्र समझौते, ख़रीद और रक्षा बजट पड़ोस की सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें तो बनाता ही है.

मीडिया और अमन

 एक लंबे अरसे के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना हुई है. अलग-अलग राज्यों में अलग अलग पार्टियों का प्रभाव बना है. सैनिक शासन के बाद अभी इस सरकार को साल भी पूरा नहीं हुआ है. फिर चरमपंथ की ताज़ा स्थिति से एक दिन में नहीं निपटा जा सकता
आईए रहमान, वरिष्ठ पत्रकार

शुक्रवार को दिल्ली में पत्रकारों के साथ भारत-पाकिस्तान संबंधों के बनते-बिगड़ते बिंबों पर बातचीत के लिए प्रतिनिधिमंडल की एक अलग बैठक भी आयोजित की गई.

बातचीत के दौरान जो एक बात सबसे ज़्यादा चिंताजनक तरीके से देखी गई वो भी पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान भारत और पाकिस्तान की मीडिया की भूमिका.

लगभग सबने एक सुर में पाकिस्तान की मीडिया को तो जमकर कोसा ही, भारतीय मीडिया को भी आड़े हाथों लिया और आरोप लगे कि मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की कवरेज़ निहायत ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से की गई.

इसके अलावा यह बात भी सामने आई कि ताज़ा हालातों तक पाकिस्तान के पहुंचने के पीछे कहीं न कहीं अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान का वजूद बाकी रहना और पिछले कुछ दशकों में धार्मिक कट्टरवाद को पनपने देना भी अहम कारण हैं.

चरमपंथी
भारत का आरोप है कि मुंबई पर हमलों में पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों की भी भूमिका हो सकती है

पर जिन देशों की ओर सबसे ज़्यादा उंगलियाँ उठीं, उनमें बार बार अमरीका और फिर अरब देशों का काम लिया गया.

रक्षा विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि अगर तालेबान, अल क़ायदा और कुछ अन्य प्रमुख चरमपंथी संगठनों के विचारों, सिद्धांतों का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि इनकी पूजा, वेशभूषा और धर्म की समझ वहाबी विचारधारा के अनुरूप है. शिक्षा, महिलाओं, हिंसा और जेहाद पर ये एक जैसी बात करते नज़र आते हैं.

ज़ोर इसपर भी रहा कि कैसे तनाव की स्थिति पैदा होने पर अमन की कोशिशों के लिए तत्काल क़दम उठाने वाले फ़ोरम या मंच तैयार हों और काम करें.

पर सवाल यह भी है कि मज़बूत और पैने सियासी पैतरों के बीच मुट्ठी भर आवाज़ें माहौल को बदलने की कवायद में कितनी कारगर साबित होंगी. साथ ही दोनों ओर के लोगों को ये कैसे अपनी बात समझा पाएंगे. कैसे इनकी आवाज़ में आम आदमी की आवाज़ भी शामिल हो सकेगी.

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