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रविवार, 14 सितंबर, 2008 को 11:07 GMT तक के समाचार
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कहीं सन्नाटा कहीं भीड़

कनॉट प्लेस
आम तौर पर भीड़भाड़ से घिरा रहने वाला कनॉट प्लेस इलाक़ा बिल्कुल सुनसान है

दिल्ली में बम धमाकों के एक दिन बाद जहां किसी घटनास्थल पर सन्नाटा है तो कहीं तमाशबीनों की भीड़ लगी हुई है.

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क और बाराखंभा रोड पर धमाका हुआ था. रविवार की सुबह जहां सेंट्रल पार्क बिल्कुल खाली था वहीं बाराखंभा पर कई लोग मौजूद थे.

साथ ही थी मीडिया और पुलिसकर्मियों की भीड़ भी.

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क जहाँ रविवार को नौजवान जोड़ों की भीड़ होती है. वहाँ सन्नाटा पसरा था. पार्क में एक भी लोग नहीं थे. यहाँ तक के उससे गुज़रने वाली सड़क भी पूरी तरह ख़ाली ख़ाली थी.

पार्क से बाहर खड़ी एक युवती ने कहा कि यहाँ आकर बहुत अजीब सा लग रहा है. उसका कहना था, ' मैं डरी नहीं हूँ इसलिए मैं यहाँ आई हूँ और मुझे देश की सुरक्षा व्यवस्था पर पूरा विश्वास है.'

जो लोग कनॉट प्लेस आए थे वो काफी डरे हुए थे और उनका कहना था कि यदि उन्हें ज़रुरी काम नहीं होता तो वो कम से कम आज तो कनॉट प्लेस कतई नहीं आते. लोगो का कहना था कि जीना है इसिलए आना पड़ रहा है.

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क से गुज़र रहे एक ऑटो रिक्शा चालक अनवर आलम जो पिछले दस साल से दिल्ली में ऑटो रिक्शा चलाते हैं का कहना था कि उन्होंने कनॉट प्लेस को इस तरह सूना सूना कभी नहीं देखा. जिस तरह लोग डरे हुए हैं ऐसा ख़ोफ़ का माहौल भी कभी नहीं देखा.

बाराखंभा पर भीड़

सेंट्रल पार्क के उलट बाराखंभा रोड के धमाके के स्थान पर तामाशबीनों की भीड़ लगी थी और जो भी राहगीर बाराखंभा रोड से गुज़र रहा था वो अपनी गाड़ी को धीरे कर एक बार ज़रुर धमाके के जगह को देख रहा था. पुलिस ने धमाके के स्थान को घेर रखा था और यहाँ पुलिस भी बड़ी तादाद मौजूद थी.

बाराखंभा रोड
बाराखंभा रोड पर तमाशबीनों के अलावा पुलिस और मीडियाकर्मियों की भीड़

एक तमाशबीन वीर पाल का कहना था कि धमाकों की वजह से बच्चे भी काफी डर गए हैं, वो समझ नहीं पा रहे हैं कि उनको कैसे समझाए.

बात करने पर कई लोगों ने अपना गुस्सा सरकार पर उतारा. लोगों का कहना था कि जिस देश में करोड़ो लोग ग़रीब हैं और इससे मर रहे हैं वहाँ सरकार को आम लोगो की चिंता कैसे हो सकती है. सरकार सिर्फ राजनीति कर रही है. धमाकों की उसे चिंतो नहीं. जब दिल्ली सुरक्षित नहीं है तो देश का कौन सा हिस्सा सुरक्षित हो सकता है.'

जबकि एक दूसरे शख़्स का कहना था कि चरमपंथी हमारे देश और लोगो के हौसलो को कम नहीं कर सकते हैं.

दिल्ली के लोग अब नए सिरे से ज़िंदगी शुरु करेंगे लेकिन शनिवार को जो कुछ हुआ उसकी तल्ख़ यादें दिल्ली वालो का बहुत दिन तक पीछा करेंगे. दिल्ली का दर्द अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

गौरतलब है कि शनिवार की शाम दिल्ली के तीन विभिन्न स्थानों पर बम धमाके हुए जिसमें 20 लोग मारे गए और लगभग 90 से ज़्यादा लोग घायल हुए.

 धमाकेसहमी सी फ़िज़ां
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विस्फोट के बाद का एक दृश्य'कई लोग नीचे पड़े थे'
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धमाकादिल्ली तब और अब...
अक्टूबर 2005 के धमाकों के बाद भी दिल्ली की सुरक्षा कितनी तय हो सकी.
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