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वोट से ज़्यादा नोट की चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में मनमोहन सिंह की सरकार ने विश्वासमत जीत लिया है लेकिन अख़बारों में जितनी चर्चा वोटों की है उससे अधिक चर्चा नोटों की है जो भाजपा के सांसदों ने संसद में लहराए. लगभग सभी अख़बारों ने संसद की वह तस्वीर प्रमुखता से प्रकाशित की है जिसमें सांसदों को हाथों में नोटों के बंडल लिए दिखाया गया है. शीर्षकों में भी विश्वासमत के साथ संसद की इस घटना का ज़िक्र किया गया है और शर्मनाक, शर्मसार, संसद हारी, संसद को चोट जैसे शीर्षक लगाए गए हैं. अख़बारों को देखकर साफ़ लगता है कि नोटों के बंडलों ने यूपीए सरकार की जीत को छोटा कर दिया है और इस पर एक तरह से सवाल खड़े कर दिए हैं. 'अमर उजाला' ने बड़ा सा शीर्षक लगाया है, 'शर्मनाक' और साथ में भाजपा सांसदों की तस्वीर प्रकाशित की है जिसमें सांसदों को नोट के बंडल लिए दिखाया गया है. विश्वासमत के बारे में अख़बार ने अपेक्षाकृत छोटे अक्षरों में लिखा है, 'क्रॉस वोटिंग ने बचाई सरकार' 'हिंदुस्तान' ने भी यही तस्वीर प्रकाशित की है और शीर्षक लगाया है, 'सरकार बरकरार, सियासत शर्मसार'. अख़बार की मुख्य संपादक मृणाल पांडे ने अपने हस्ताक्षर से पहले पेज पर एक विशेष संपादकीय टिप्पणी लिखी है. इस टिप्पणी में उन्होंने अपने सांसदों को संसद में नोट ले जाने की अनुमति देने के लालकृष्ण आडवाणी के फ़ैसले पर भी सवाल उठाए हैं. 'दैनिक जागरण' ने हाथ में तलवार लिए मनमोहन सिंह का कैरिकैचर प्रकाशित किया है और शीर्षक लगाया है, 'सरकार जीती संसद हारी' अख़बार ने एक ख़बर भी प्रकाशित की है कि किस तरह सांसदों के गिरहबान पकड़ने से लेकर ज़बरदस्ती वोट बदलवाने की कोशिशें भी हुईं. अंग्रेज़ी के अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने व्यंग्यात्मक शीर्षक लगाते हुए लिखा है, 'यूपीए अमर रहे, बट एट ए प्राइस' यानी यूपीए अमर रहे लेकिन क़ीमत चुकाकर.
अख़बार ने लिखा है कि जिस दिन संसद में नोट लहराए गए उसी दिन 28 सांसदों ने अपनी निष्ठा बदली. इसी तरह 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने हाथों में नोट लिए सांसदों की तस्वीर प्रकाशित करते हुए उस पर लाल रंग से बड़ा शीर्षक प्रकाशित किया है, 'शेम' यानी शर्म. अख़बार ने लिखा है कि विश्वासमत जीतने के बाद अब जल्दी ही मंत्रिमंडल में फेरबदल की बारी है. 'पायोनियर' ने शीर्षक लगाया है, 'यूपीए विन्स वोट, लूसेस ट्रस्ट' यानी यूपीए ने मत जीता लेकिन विश्वास खोया. 'इकॉनॉमिक टाइम्स' ने भी इसी से मिलता जुलता शीर्षक लगाया है, 'ट्रस्ट विन्स, डिसट्रस्ट टू' 'इंडियन एक्सप्रेस' ने ज़रुर मनमोहन सिंह के विश्वासमत जीतने को प्रमुखता दी है और सांसदों के नोट लहराने वाली ख़बर पर टिप्पणी की है कि विश्वासमत से पहले किस तरह नोट आए और फिर यह मुद्दा हाशिए पर चला गया. |
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