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मंगलवार, 24 जून, 2008 को 16:56 GMT तक के समाचार
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एमके पंधे की चेतावनी निंदनीय है

सीपीएम पोलित ब्यूरो
परमाणु करार समझौते का वामदल विरोध कर रहे हैं
यह भारतीय राजनीति का गिरता हुआ स्तर है या फिर राजनीतिज्ञों में लुप्त हो रही संवेदनशीलता और सार्वजनिक नैतिकता का एक और उदाहरण. लेकिन परमाणु करार पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के एक वरिष्ठ नेता ने जिस तरह से समाजवादी पार्टी को परमाणु समझौते का समर्थन करने पर अपने मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धो बैठने की चेतावनी दी है, वह निश्चित रुप से निंदनीय है.

भारत में लगभग सभी राजनीतिक दल मौका पड़ने पर और अपने लाभ के लिए जाति और धर्म से जुड़े मामले उठाने से नहीं चूकते.

भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना आदि पर तो हमेशा से ही सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगा है और ये आरोप सही भी होते हैं.

कांग्रेस भी समय-समय पर इस तरह के क़दम उठाती रही है कि उस पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया गया है. कांग्रेस के ख़िलाफ़ भी कई आरोपों में काफ़ी दम होता है.

वामदल भी अब तक इन आरोपों से अछूते नहीं थे पर सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य एमके पंधे ने सोमवार को परमाणु करार के संदर्भ में जिस तरह समाजवादी पार्टी को चेतावनी दी है उसके बाद उन्हें धर्म को राजनीति से अलग रखने जैसी बातें कहने और सार्वजनिक नैतिकता के उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता.

 हैरानी की बात है कि हिंदुत्व की बात करने वाली बीजेपी भी परमाणु करार के ख़िलाफ़ है

इससे ज़्यादा आप किसी भी सार्वजनिक बहस और चर्चा को सांप्रदायिक और धार्मिक जामा क्या पहनाएँगे कि परमाणु करार के ख़िलाफ़ देश के सभी मुसलमानों को लामबंद करने का प्रयास करें.

वामदलों को परमाणु करार का विरोध करने का उतना ही अधिकार है जितना कि कांग्रेस को इस समझौते का समर्थन करने का.

पर वामदलों को, या कहिए श्री पंधे को, जिनके बयान की आलोचना वाममोर्चे के किसी भी नेता ने अब तक नहीं की है, यह अधिकार किसने दिया है कि वह इस मामले को हिंदु-मुस्लिम या सांप्रदायिक जामा पहनाएँ.

मतभेद

वामदल और कांग्रेस के नेता
परमाणु करार के बारे में लोगों को शिक्षित करने की ज़रूरत है

क्या वामदल के नेताओं का यह मानना है कि उत्तर प्रदेश और भारत का हर मुसलमान न सिर्फ़ अमरीका विरोधी है बल्कि अमरीका के साथ होने वाले किसी भी समझौते का वह हर क़ीमत पर विरोध करेगा.

न सिर्फ़ समझौते का विरोध करेगा बल्कि हर उस राजनीतिक दल और व्यक्ति के विरुद्ध हो जाएगा जो परमाणु समझौते के पक्ष में हैं.

अगर इसी तर्क को और आगे बढ़ाया जाए तो बकौल वामदलों के भारत के मुसलमानों को भारत के हित और अहित कि चिंता नहीं होगी.

वह परमाणु करार को सिर्फ़ अपने अमरीकी विरोधी चश्मे कि नज़र से देखेगें और हर उस राजनीतिक दल के ख़िलाफ़ खड़े हो जाएँगे जो परमाणु करार के समर्थन में हैं.

अगर इसी तर्क को हम और आगे बढ़ाएं, कुतर्क की सीमा तक, तो फिर इस आधार पर तो सभी हिंदुओं को शायद परमाणु करार के समर्थन में होना चाहिए.

 सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य एम के पंधे ने सोमवार को परमाणु करार के संदर्भ में जिस तरह समाजवादी पार्टी को चेतावनी दी है उसके बाद उन्हें धर्म को राजनीति से अलग रखने जैसी बातें कहने और सार्वजनिक नैतिकता के उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता

पर हैरानी की बात है कि हिंदुत्व की बात करने वाली बीजेपी भी परमाणु करार के ख़िलाफ़ है.

कुल मिला कर बात यह है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले वाम दल के नेता भी अपने सिद्धांत का झंडा ऊँचा रखने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं.

यह तो देश कि ख़ुशक़िस्मती है कि हिंदु या मुसलमान कोई भी इन नेताओं की सोच-समझ या फिर यह कहिए कि इन नेताओं ने जो उनकी स्टिरीयोटाइप छवि बनाई हुई है उस पर खरे नहीं उतरते.

बेहतर होगा कि ये राजनेता परमाणु करार के मामले पर मुसलमान हों या हिंदु... सभी को अपने मत से परिचित कराएँ और राष्ट्रहित के संदर्भ में उन्हें शिक्षित करें और अपने पक्ष में समर्थन जुटाएँ.

पहले ही सार्वजनिक मामलों को धार्मिक भावनाओं और उन्माद से जोड़ने की भारतीय राजनीतिज्ञों की नासमझी की बड़ी क़ीमत देश अदा कर चुका है.

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