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पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में चार प्रांत या सूबे हैं लेकिन उसके अलावा वहाँ एक और इलाक़ा है जिसे क़बायली इलाक़ा कहा जाता है. ये एक स्वायत्त इलाक़ा है जिसकी सीमा अफ़ग़ानिस्तान से लगती है. पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को बाँटनेवाली डूरंड रेखा की लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा लगती है इस क़बायली इलाक़े से. सरकारी तौर पर इन क़बायली इलाक़ों का नाम है – फ़ाटा (एफ़एटीए) अर्थात् फ़ेडरली एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज़ – अर्थात् संघ शासित क़बायली क्षेत्र. वैसे आम तौर पर पाकिस्तान में इन सातों इलाक़ों को एजेन्सीज़ कहकर पुकारा जाता है. कुल मिलाकर सात क़बायली इलाक़े हैं फ़ाटा में – ख़ैबर, ख़ुर्रम, ओरकज़इ, मोहमंद, बाजौड़, उत्तरी व़ज़ीरिस्तान और दक्षिणी वज़ीरिस्तान. इन सात क्षेत्रों में 40 से अधिक क़बीलों के लोग रहते हैं. आबादी लगभग 60 लाख है और सारे लोग पख़्तून हैं. अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के सत्ता से बाहर होने के बाद से ये क़बायली इलाक़े पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती बने हुए हैं. विशेष दर्जा
क़बायलियों को हमेशा से ही स्वतंत्र रहना पसंद रहा है. औपनिवेशिक काल में भी उन्होंने अंग्रेज़ों की सत्ता का ज़ोरदार विरोध किया. इसी कारण अंग्रेज़ों ने इन इलाक़ों को स्वायत्त रखा और स्थानीय लोगों को इस्लामी मान्यताओं और अपने रस्मो-रिवाज़ के आधार पर काम करने की यथासंभव छूट दी. अंग्रेज़ों ने ही फ़ाटा के शासन का स्वरूप तय किया था. वे ये भी सोचते थे कि ये इलाक़े भारत और अफ़ग़ानिस्तान के मध्य बफ़र ज़ोन या मध्यवर्ती क्षेत्र का काम करेंगे. क़बायली इलाक़ों को दी गई विशेष सुविधाओं के बदले में क़बायली नेता, जिन्हें मालिक कहा जाता है, वे ये सुनिश्चित करते थे कि इन इलाक़ों में अमन-चैन बना रहे और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान को जोड़नेवाला ख़ैबर दर्रा चालू रहे. अब पाकिस्तान को बनने के छह दशक बाद भी क़बायली इलाक़ों में शासन के तौर-तरीक़े बदले नहीं हैं. 1997 में वहाँ वयस्क मताधिकार तो लागू किया गया लेकिन राजनीतिक दलों पर वहाँ प्रतिबंध है. यानी चुनाव में उम्मीदवार तो होते हैं लेकिन वे किसी पार्टी के झंडे तले चुनाव नहीं लड़ सकते. इसी तरह वहाँ ना तो पाकिस्तानी पुलिस, और ना पाकिस्तानी न्यायालय को क़बायली इलाक़ों में कोई अधिकार प्राप्त है. ये सारा दायित्व स्थानीय लोग संभालते हैं. चुनौती
ऐसा कहा जाता रहा है कि तालेबान के लोगों ने क़बायली इलाक़ों में ही पनाह ली हुई है. वहीं ओसामा बिन लादेन समेत अल क़ायदा के उनके समर्थक भी इन्हीं क़बायली इलाकों में कहीं छिपे हुए हैं. ये सारा इलाक़ा अत्यंत दुर्गम है और वहाँ स्थानीय लोगों में इस्लामवादी कट्टरपंथियों को लेकर सहानुभूति भी रही है. 9/11 के हमले के बाद आतंकवाद के विरूद्ध अमरीका की अगुआई में शुरू हुई लड़ाई में अमरीका के मित्र पाकिस्तान ने क़बायली इलाक़ों में कार्रवाई शुरू की. दोनों पक्षों के बीच कई बार संघर्ष हुए. लेकिन इसके बाद कई बार स्थानीय बुज़ुर्गों या नेताओं के सहयोग से विद्रोहियों और सरकार के बीच समझौते भी हुए. सबसे अधिक चर्चा हुई थी सितंबर 2006 में हुए समझौते की जिसमें उत्तरी वज़ीरिस्तान के विद्रोहियों के साथ समझौता हुआ था. लेकिन कोई साल भर के बाद अगस्त 2007 में ये समझौता टूट गया. बेतुल्ला मेहसूद
अब अप्रैल 2008 में बेतुल्ला मेहसूद के साथ समझौते की बात उठी है. बेतुल्ला दक्षिणी वज़ीरिस्तान के मेहसूद क़बीले के नेता हैं और उन्हें अभी पाकिस्तान में तालेबान विद्रोहियों का सबसे बड़ा नेता माना जाता है. उन्होंने पिछले वर्ष नवंबर में तहरीके-तालिबान-पाकिस्तान नाम का एक गुट बनाया था. इसके बाद जितने भी अन्य छोटे-बड़े तालेबान समर्थक गुट थे उनमें से अधिकतर बेतुल्ला के गुट के साथ हो गए. क़बायली इलाक़ों के अलावा पाकिस्तान में तालेबान समर्थकों के प्रभाव वाला एक और इलाक़ा है –स्वात घाटी. स्वात घाटी पाकिस्तान के प्रांत सरहदी सूबे या उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत में पड़ता है जो अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगा है. वहाँ भी बेतुल्ला मेहसूद का ख़ासा प्रभाव है और स्वात घाटी में विद्रोहियों के नेता मौलाना फ़ज़लुल्लाह बेतुल्ला मेहसूद के ख़ासे क़रीबी माने जाते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें वज़ीरिस्तान में 'संघर्षविराम' की घोषणा07 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस बैतुल्ला: कट्टर कबायली चरमपंथी29 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस स्वात घाटी में बुद्ध प्रतिमा का सिर उड़ाया29 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में चरमपंथी ठिकानों पर हमले19 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तरी वज़ीरिस्तान में समझौता05 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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