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बुरे सपने की तरह याद आता है नेली नरसंहार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़रवरी 1983 में हुए नेली नरसंहार को भारत में हुई बड़ी सांप्रदायिक हिंसक घटनाओं में गिना जाता है. इस हिंसा में सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल 1819 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. इस घटना में नेली क़स्बे के आसपास के 12 गाँवों पर एक साथ सशस्त्र हमला किया गया था. चौथाई सदी बीतने के बाद भी नेली के लोग ख़ून-ख़राबे की इस भयानक घटना को भूल नहीं पाए हैं. सिलभेटा गाँव में रहने वाले 55 वर्षीय नज़रूल हक को अपनी जवानी के दिनों में घटी उस घटना के सूक्ष्म ब्यौरे तक याद हैं. नज़रूल बताते हैं कि किस तरह हमला होने के बाद वे लोग सरपट भागे और पास के एक खेत में जमा हो गए. भागते वक़्त उनकी टाँग पर भी एक गोली लगी लेकिन सौभाग्यवश वे जिंदा बच गए. उनका भांजा और साथ ही रहने वाले सास-ससुर भागते वक़्त मारे गए थे. चार बच्चों के पिता नज़रूल बताते हैं कि "अब भी उस दिन के डरावने सपने आते हैं, और मैं जाग उठता हूँ". वे बताते हैं कि चारों तरफ़ लाशें ही लाशें थीं, किसी-किसी कब्र में तो एक साथ सौ लोगों को दफ़नाया गया था. घटना के कारणों के बारे में हक कहते हैं कि "चुनाव सामने थे और हमने मतदान करने का फैसला कर रखा था इसलिए हमला हुआ". नई पीढ़ी सिलभेटा से आगे मुलाधारी गांव में युवा मुदर्रिस इंदादुल इस्लाम नेली कांड के तीन साल बाद पैदा हुए थे फिर भी सारी घटना अपने बुजुर्गों से कई बार सुन चुके हैं. आखिर कैसे नहीं सुनते. उनके दादा-दादी, तीन बुआएं और एक चाचा उस दिन की पाशविकता की बलि चढ़ चुके थे.
पास के ही माटीपर्वत गांव में अशरफ अली साइकिल पर घूम-घूमकर सूखी मछलियां बेचते हैं. उन्हें सारी घटना पूरी तरह याद है. वे बताते हैं, "सब कुछ अलसुबह ही शुरू हो गया था. पहले आसपास के 12 गाँवों के घरों में आग लगाई गई. फिर गांवों को घेर लिया गया. आग के कारण लोग बाहर निकलने को मजबूर हुए और फिर उन पर हमला हुआ. हमले में धारदार हथियारों के साथ बंदूकों का भी इस्तेमाल हुआ". वे कौन लोग थे? इस पर 45 वर्षीय अली निःसंकोच कहते हैं, लालुंग, कछारी, असमिया लोग थे. अली ने नियति को स्वीकार कर लिया है, "बस अब तो हर तरह के लोगों के साथ मिलजुलकर रहना है. हमें तो हर तरह के ग्राहकों से निबाहना पड़ता है". मुलाधारी गाँव के उस्मान गनी को यह अच्छी तरह याद है कि उस दिन शुक्रवार था और 'इन्हीं दिनों' वह कांड हुआ था. वह "तिरासी सन' की बात है. लेकिन अब सब कुछ शांत है, हम शांति से रहना चाहते हैं. हमें किसी से शिकायत नहीं. नमस्कार कहते हुए 74 वर्षीय बुजुर्ग आकाश अली खुद ही हमारे नजदीक चले आते हैं. उन्हें पता है कि नेली कांड को हुए चौथाई सदी बीत गई है. सांप्रदायिकता की आग में उनकी माँ की जान चली गई. दो बच्चे जख्मी हुए थे. वे कहते हैं, "जानते नहीं थे इतनी बड़ी घटना हो जाएगी. हम दौड़कर किसी तरह किलिंग नदी के उस पार पहुँचे. शाम तीन बजे तक सीआरपी वाले आए तब तक हम जंगल में ही छिपे रहे." माटीपर्वत की हाजीरा खातून अपने हाथ पर जले हुए के निशान दिखाती हैं. उन्हें जलती मशाल से मारा गया था. "अल्लाह का शुक्र है कि जान बच गई. आज तक यह हाथ पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया". क्या किसी पर गुस्सा आता है? यह पूछने पर वे कहती हैं, "नहीं, गुस्सा किस पर करें. सब नसीब की बात है". रहीमा बेगम उस दिन को कभी नहीं भूलतीं. जबड़े पर फरसे से किए गए हमले का निशान उसकी याद दिलाता रहता है. घटना में उनका लड़का जख्मी हुआ था लेकिन जान बच गई. हमले का कारण पता नहीं, "मर्दों से पूछिए". हमलावर मुख्य राजमार्ग के किनारे पक्के घर में रहने वाले वृंदा कुमार काकती टिवा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. अखबारों में नेली की घटना का मुख्य अपराधी इसी टिवा समुदाय को करार दिया गया था. काकती जैसों पर दर्जनों मामले दर्ज दिए गए. वृंदा और अन्य दो लोगों पर कुल 336 मुकदमे दर्ज किए थे. वे आक्रमण के कारणों पर कुछ भी कहने से परहेज करते हैं. लेकिन इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अब वैसी घटना की पुनरावृत्ति होने की आशंका कतई नहीं है क्योंकि 'वे लोग अब दबकर रहना सीख गए हैं'.
नेली के पास जागीरोड कॉलेज में व्याख्याता तुलसी बरदलै भी टिवा समुदाय से ही हैं. वे नहीं चाहते कि नेली के गड़े मुर्दों को फिर से उखाड़ा जाए. घटना के कारणों पर कहते हैं, "कई कारण थे. एक कारण यह भी था कि आसपास के लोगों को लालच दिया गया था कि "इन लोगों' के चले जाने पर आप लोगों को काफी ज़मीन मिल जाएगी". तुलसी बरदलै को इस बात में कोई शक नहीं कि आज के दिन वैसी घटना की पुनरावृत्ति की कोई आशंका नहीं है. उनका कहना है कि आज असम के मूल निवासी ही आपस में बँटे हुए हैं. घटना की सारी जिम्मेदारी टिवा समुदाय पर थोप दिए जाने पर उन्हें नाराज़गी है. नेली इलाके का दौरा करने के बाद यह बात स्पष्ट होती है कि भुक्तभोगियों में घटना की स्मृति काफी ताज़ा होने के बावजूद हमलावरों या उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में नाकाम रही सरकारी एजेंसियों के विरुद्ध किसी तरह का गुस्सा बिल्कुल नदारद है. दूसरी ओर स्थानीय टिवा समुदाय घटना का विश्लेषण कर अपने-आपको ठगा गया महसूस कर रहा है. टिवा समुदाय के लोगों को लगता है कि असम आंदोलन के नेताओं ने घटना की सारी जिम्मेवारी उन पर थोपकर उनके साथ अन्याय किया है. | इससे जुड़ी ख़बरें गुजरात में दंगा भड़का, दो की मौत10 नवंबर, 2003 | भारत और पड़ोस केरल में जनजीवन प्रभावित | भारत और पड़ोस गोरखपुर में सांप्रदायिक हिंसा | भारत और पड़ोस न्याय से ही न्याय के लिए उठते सवाल20 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दलितों के प्रति हिंसा: एक नज़र05 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस कश्मीर में नरसंहार | भारत और पड़ोस झारखंड नरसंहार में नामज़द प्राथमिकी29 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'बड़ा पेड़ गिरने पर हिलती है धरती...'01 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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