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गाँव की ओर 'वापसी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या आप किसानों की तरह जीवन जीने के लिए छह हज़ार रूपए खर्च करेंगें? जी हां! भारत के कुछ धनी लोग ग्रामीण जीवन का सुख भोगने के लिए एक रात के लिए तक़रीबन 150 डॉलर यानि 6000 रूपए खर्च कर रहे हैं. कर्नाटक की राजधानी बंगलौर से थोड़ी ही दूर एक गाँव हेसरगाटा का विकास भारतीय ग्रामीण परिवेश और रीति-रिवाजों को सुरक्षित रखने और उसे बढ़ावा देने के लिए किया गया है. इस गाँव में लोगों को गाय दुहने और टर्की, बत्तख, मुर्गी, कुत्ते जैसे पशु-पक्षियों की देखभाल करने का मौक़ा मिलता है. राम कुमार ने इस गाँव की कल्पना की और वे इस गाँव की देखभाल करते हैं. उन्होंने बीबीसी के 'कल्चरल शॉक' कार्यक्रम में बताया, "शहर में रहने वाले लोगों के लिए टर्की को देखना किसी अजूबे से कम नहीं है. वे लोग पूछते हैं कि ये क्या है? इन पशु-पक्षियों को गाँव में देखना सुखद है." पर्यावरण को ध्यान में रख कर विकसित इस गाँव में तालाब 'स्विमिंग पूल' के काम आता है. तालाब के पानी को साफ-सुथरा रखने के लिए किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि पानी में उगने वाले पौधों का इस्तेमाल किया जाता है. साधारण जीवन गाँव में एक खुला मैदान है जहाँ लोग पारंपरिक खेल खेलते हैं, पतंग उड़ाते हैं. यहाँ पर एक मंदिर भी है. राम कुमार कहते हैं, " हमारे गाँव का मंदिर काफ़ी धर्मनिरपेक्ष है. यहाँ पर भारतीय देवी-देवताओं को साथ साथ मुस्लिम और ईसाई धर्म के भी प्रतीक रखे हुए हैं. हम चाहते हैं कि यह एक ऐसी जगह हो जहाँ पर हर कोई पूजा कर सके." गाँव में यातायात के लिए बैलगाड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. राम कुमार कहते हैं, " जब आप बैलगाड़ी पर होते हैं कितना कुछ देख पाते हैं. तितलियाँ, मधुमक्खियाँ और टर्की को अपने पास पाते हैं." फ़्यूचर लेबॉरेटरी के निदेशक मार्टिन रेमंड ने 'कल्चर शॉक' कार्यक्रम में बताया कि पूरे विश्व में साधारण जीवन जीने की एक ललक पैदा हो रही है. उनका कहना था, "उदाहरण के लिए भारत के क़रीब दो करोड़ 25 लाख मध्यवर्गीय जनता इसे एक आकर्षक प्रस्ताव के तौर पर लेंगे क्योंकि यह उनके जीवन की कुछ इच्छाओं को पूरा करता है." लेकिन कुछ मनोवैज्ञानिक इसे पुरानी जीवन शैली से जुड़ने की ललक बताते हैं यानि उस चीज़ को फिर से स्थापित करना जो कभी थी ही नहीं. | इससे जुड़ी ख़बरें पिछड़ों का एक अगड़ा गाँव29 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस अधूरे छूटते दिख रहे हैं 'पुरा' गाँव26 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस घोड़ी नहीं उड़नखटोला!05 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'अप्पन समाचार' की ख़ूब धूम है21 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस जहाँ रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता08 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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