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जहाँ रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का पर्व रक्षाबंधन पूरे भारत में उत्साह से मनाया जाता है लेकिन बिहार में एक गाँव ऐसा भी है जहाँ कई पीढ़ियों से राखी नहीं बाँधी गई है. ये है समस्तीपुर ज़िले में दलसिंगसराय अनुमंडल का रामपुर-जलालपुर गाँव. रामपुर-जलालपुर गाँव के मैथिल ब्राह्मणों के समाज में सदियों से राखी बांधने की परंपरा नहीं है. ऐसा क्यों है, इस सवाल पर गाँव के लोग भी एकमत नहीं हैं. रामपुर-जलालपुर गाँव में ही स्थित डाकघर के पूर्व पोस्टमास्टर चन्द्रशेखर प्रसाद चौधरी की मानें तो 1952 से 1975 के उनके कार्यकाल दौरान ब्राह्मण समाज में न तो कहीं से राखी आती थी और न ही कहीं भेजी जाती थी. यह बात आज भी लागू है. 'पता नहीं' सेवानिवृत शिक्षक विशेश्वर चौधरी 86 साल के हैं. उनका कहना है कि उन्हें याद नहीं कि किस कारण से ऐसा होता है. विशेश्वर चौधरी अनुमान लगाते हैं कि दो भाइयों के बसाए इस गाँव में पूर्व में किसी घर में अनहोनी हुई होगी, इसीलिए क़रीब दस पीढ़ियों से भी अधिक से यहाँ रक्षाबंधन मनाया ही नहीं जाता.
अधिवक्ता चन्द्रभूषण चौधरी रक्षाबंधन नहीं मनाने की अज़ीबोगरीब परंपरा के बारे एक अलग तरह का तर्क देते हैं. उन्होंने कहा, "यह मिथिला का क्षेत्र है और मिथिला में भाई-बहनों का पर्व भैया-दूज काफी धूमधाम से मनाया जाता है. संभव है पूर्वजों ने इसे द्वितीय पर्व मान मनाना छोड़ दिया हो." हालाँकि मिथिला क्षेत्र के बाक़ी इलाक़ों में ये बात क्यों नहीं है, इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है. गाँव की बेटी निशा चौधरी ने एक वाक़ये का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक बार वह अपने भाई को राखी बाँधने घर आई थीं, लेकिन रक्षाबंधन के एक दिन पूर्व छत से गिर गईं. उन्होंने कहा कि यहाँ राखी बाँधने के प्रयास से ही भाई या बहन के साथ कोई न कोई दुर्घटना या अनहोनी हो जाती है. गाँव की मुखिया सुजाता चौधरी इस बारे में कहती हैं, "कारण जो भी रहा हो. सच्चाई यही है कि वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में कोई ज़ोखिम नहीं उठाना चाहता." गाँव की युवा पीढ़ी इस अंधविश्वास को तोड़ने को उत्सुक दिखती अवश्य है परंतु बुजुर्गों के सामने वह अपने को असहाय पाती है. | इससे जुड़ी ख़बरें राखी ने बढ़ाया ई-बिज़नेस का बाज़ार08 अगस्त, 2006 | मनोरंजन भारतीय कलाइयों पर चीनी राखियाँ30 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस और अब चीनी राखियाँ भी12 अगस्त, 2003 | कारोबार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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