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मंगलवार, 08 अगस्त, 2006 को 10:36 GMT तक के समाचार
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राखी ने बढ़ाया ई-बिज़नेस का बाज़ार

राखी
परदेस में बसे भाई-बहन एक दूसरे को इंटरनेट कंपनियों के ज़रिए राखी और तोहफ़े भिजवा रहे हैं
राखी....कहने को तो एक मामूली सा धागा है पर रिश्तों की गहराइयों में जाकर महसूस करें तो भाई-बहन के रिश्ते को बाँधती एक नाज़ुक डोर.

रक्षा बंधन के दिन अगर बहन एक छोर हो और भाई हज़ारों मील दूर विदेश में दूसरे छोर तो मन में टीस उठना स्वभाविक है.

लेकिन ये इंटरनेट का युग है और व्यवसायीकरण का भी. सो इंटरनेट और व्यवसायीकरण के इस मिश्रण ने ऑनलाइन राखी के चलन को काफ़ी बढ़ावा दिया है.

अगर आप इंटरनेट पर जाकर ढूँढे, तो ऐसी अनगिनत वेबसाइट मिल जाएँगी जहाँ क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान करिए और आप अपने प्यारे भइया के नाम अपनी पंसद की राखी भिजवा सकती हैं- फिर आपका भाई दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो.

इसमें साधारण राखी से लेकर, ज़रदोज़ी, मोती या हीरे जड़ी राखी भी शामिल है.

भारत के मनन शर्मा लखनऊ में इसी तरह की इंटरनेट कंपनी चलाते हैं.

ऑनलाइन राखी के बढ़ते चलन के बारे में वे बताते हैं, “पहले जब आप राखी खरीदने जाते थे तो दो-चार धागे मिलते थे. लेकिन अब इंटरनेट पर 10 मिनट में दस तरीके की ऐसी चीज़ें मिल जाती हैं जिसमें कोई न कोई आपके भाई के पसंद ज़रूर होती है, और फिर वो चीज़ें आपके भाई के घर पहुँचा भी दी जाती हैं. इतनी सुविधा पहले कभी नहीं थी.”

भावनाओं का व्यवसायीकरण ?

इंटरनेट कंपनियों के ज़रिए आप राखी ही नहीं टीके-रोली से सजी पूरी थाली भिजवा सकते हैं

इसे व्यवसायीकरण का असर कहिए या कुछ और पर बात सिर्फ़ राखी तक ही नहीं रुकती.

इन इंटरनेट कंपनियों को आप राखी के साथ-साथ टीका,रोली, अक्षत, दिये और मिठाई से सजी-सजाई राखी की पारंपरिक थाली भी अपने रिश्तेदारों के घर पहुँचाने का ऑर्डर दे सकते हैं.

विदेशों में बसे कई भारतीय–ख़ासकर अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा और खाड़ी के देशों में लोग इस तरह की सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. बहन राखी पहुँचाने के लिए तो भाई तोहफ़े पहुँचाने के लिए.

 इंटरनेट के ज़रिए जब परदेस में हमें राखी मिलती हैं तो राखी से जुड़ी मधुर यादें फिर जीवंत हो जाती हैं
आलोक सक्सेना

इंटरनेट से अपने भाई को राखी भेजने वाली लंदन की श्वेता त्रिवेदी कहती हैं कि अब वे इंटरनेट पर आसानी से राखी पंसद कर अपने भाई को भिजवा सकती हैं और उनके मन को सुकून मिलता है कि वे परदेस में रहकर भी राखी का बंधन निभा रही हैं.

और परदेस में जब एक भाई को इस तरह राखी मिलती है तो कैसा लगता है उसे?

दुबई में बसे आलोक सक्सेना बताते हैं, "मेरा विचार इस बारे में सकारात्मक है. इंटरनेट के ज़रिए जब परदेस में हमें राखी मिलती हैं तो राखी से जुड़ी मधुर यादें फिर जीवंत हो जाती हैं, दूर रहने वाली बहन की राखी न मिलने से तो अच्छा है कि इंटरनेट के ज़रिए राखी मिले.

कंपनियों की चाँदी

इन इंटरनेट कंपिनयों पर आपको 100 रुपए से लेकर हज़ारों रुपए के मूल्य वाले तोहफ़े और राखियाँ मिल जाएँगी.

बस जितनी जेब ढीली करेंगे उतने क़ीमती तोहफ़े भेज सकतें हैं. शायद ये इंटरनेट कंपनियाँ भी जानती हैं कि आजकल लोगों के पास वक़्त कम और पैसे थोड़े ज़्यादा हैं. जैसे-जैसे ये चलन बढ़ रहा है, इन कंपनियों की तो मानो चाँदी हो गई है.

 हम चार साल से ये काम कर रहे हैं, हर साल ये व्यापार बढ़ रहा है. इस बीच प्रतियोगिता भी कड़ी हुई है, हमारे ऑर्डर हर साल बढ़ रहे हैं
मनविंदर सिंह

दिल्ली में ई-बिज़नस करने वाले मनविंदर सिंह कहते हैं, " हम चार साल से ये काम कर रहे हैं, हर साल ये व्यापार बढ़ रहा है. इस बीच प्रतियोगिता भी कड़ी हुई है, हमारे ऑर्डर हर साल बढ़ रहे हैं."

सो भावनाओं की अभिव्यक्ति ने एक नए बाज़ार का रूप ले लिया है.

लेकिन सब लोग इस नए इंटरनेट चलन से सहमत नहीं हैं. एक तो इंटरनेट पर अपने कार्ड से भुगतान करने को लेकर सुरक्षा के सवाल है. कौन सी वेबसाइट भरोसे योग्य है और कौन सी नहीं,ये सुनिश्चित करना भी जटिल काम है.

कई लोग आज भी बहन के हाथों से भेजी राखी को ही पसंद करते हैं.

कई सालों से बहरीन में रहने वाले धीरेंद्र सिंह का कहना है," यदि बहन के हाथ से लिखी चिट्ठी और राखी आती है तो उसकी बात ही दूसरी है. ऐसा लगता है मानो बहन ने ख़ुद अपने हाथ से राखी बाँधी है. इंटरनेट में वो बात नहीं है. घर से आई राखी देखकर अपने देश की, घर की और रक्षा बंधन के दिन जो पूरी खुशबू होती है वो फ़िज़ा में आ जाती है."

तो ऑनलाइन राखी के इस चलन को व्यवसायीकरण की मिसाल कहिए या बदलते ज़माने की चाल से कदमताल करने का प्रयास, या फिर एक कोशिश कि मीलों की दूरी के बावजूद रिश्तों की डोर कभी टूट न पाए.. फ़ैसला आपका है.

लंदनलंदन डायरी
राखी में बहन देश में और भाई परदेस में हो तो पीड़ा समझी जा सकती है.
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