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बढती असहिष्णुता, घटती सहनशीलता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन पश्चिम बंगाल में नहीं रह सकतीं क्योंकि कुछ लोग उनके विचारों से सहमत नहीं हैं और सत्तारूढ मार्क्सवादी पार्टी ने भी हाथ खङ़े कर दिए हैं. कल उन्हें राजस्थान पहुँचाया गया था. फिर दिल्ली ले जाया गया. क्या यह देश में बढ रही असहिष्णुता का संकेत है या फिर कुछ और...? कोलकाता को बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन अपना नया घर बताती हैं पर अब उनके लिए अपने नए घर में रहना मुश्किल हो रहा है. कोलकाता की सड़कों पर उनके ख़िलाफ़ उग्र प्रदर्शन हुआ. मामला इतना बिगड़ा कि सेना बुलाई गई. अखिल भारतीय अल्पसंख्यक मोर्चा के संयोजक इदरिस अली ने भी शायद नहीं सोचा होगा कि उनका विरोध इतना उग्र रूप धारण कर लेगा. उनका आरोप है कि तस्लीमा नसरीन जो बातें लिखती हैं, वो किसी भी मुसलमान के बर्दाश्त के बाहर हैं. इदरिस अली कहते हैं, "उन्होंने लिखा क़ुरान शरीफ़ को पैगम्बर हज़रत मोहम्मद अपना ही उद्देश्य पूरा करने के लिए लेकर आए.....इस बात को कोई मुसलमान बर्दाश्त नहीं कर सकता." पश्चिम बंगाल में ढाई करोड. मुसलमान हैं और राज्य सरकार उनकी नाराज़गी झेल नहीं सकती. फिर जब नंदीग्राम में हुई हिंसा में मारे जाने वालों में बड़ी संख्याँ में मुसलमान हों तो ज़ाहिर है कि राज्य सरकार की दिक्कतें और बढ जाती हैं. वो भी एक ऐसे माहौल में जहाँ राजनीतिक नेता हर मामले को वोट बैंक से जोड़कर देखते हों. 'राज्य के लिए ख़तरा' पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बिमान बासु ने कहा कि अगर तस्लीमा नसरीन क़ानून व्यवस्था के लिए ख़तरा हैं तो उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ देना चाहिए.
विमान बसु कहते हैं, " तस्लीमा नसरीन राज्य की क़ानून व्यवस्था के लिए ख़तरा हैं. उन्हें पश्चिम बंगाल छोङ देना चाहिए." हालाँकि उनकी पार्टी ने बाद में यह स्पष्टीकरण ज़रूर दिया कि देश में रहने की अनुमति का फ़ैसला केवल केन्द्र सरकार ही कर सकती है. अब तस्लीमा राजस्थान, दिल्ली और आगे न जाने कहाँ-कहाँ जाने को मज़बूर हो जाएँ. पर सवाल यह है कि क्यों समाज में असहिष्णुता बढ रही है? क्यों बात-बात पर धर्म पर ख़तरा मँडराने लगता है ? या फिर जब लोग वोट बनकर रह जाते हैं तो क्या लोकतंत्र मज़ाक बनकर रह जाता है? 'ज़ोर से चिल्लाओ, बात मनवाओ' समाज़शास्त्री रामचंद्र गुहा कहते हैं, "जहाँ सरकार को शोर मचाने वालों, हिंसा भड़काने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए वहाँ सरकारें इसकी बजाए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को तिलांजलि देने को तैयार रहती हैं." वे कहते हैं, "आजकल के माहौल में जो ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाता है, उसको ही सुना जाता है. जो ज़्यादा शोर मचाते हैं या ज़्यादा धमकी देते हैं, सरकार उन्हीं की बात सुनती है. सरकार में कोई भी दल हो. फिर चाहे बंगाल में वाम दल हो या गुजरात में भारतीय जनता पार्टी हो या महाराष्ट्र में कांग्रेस." रामचंद्र गुहा कहते हैं, ''मेरा मानना है कि बहुसंख्यक लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं. बंगाल में आप देखें कि कई लोगों के विरोध पत्र सामने आए हैं. जानेमाने लेखक सुनील गंगोपाध्याय ने इसे ग़लत कहा है. सौमित्रों चटर्जी ने भी ऐसा ही कहा है.'' रामचंद्र गुहा कहते हैं, ''मेरा मानना है कि यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था की कमज़ोरी है. इससे हमारे देश का नाम ख़राब हो रहा है. एक तरफ़ हम कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और दूसरी ओर कोई भी चित्रकार, कवि या लेखक समाज के सामने ख़ुद को व्यक्त नहीं कर पाता. यह बहुत ही शर्म की बात है." वे कहते हैं, ''मसलन जानेमाने चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन इस देश में नहीं रह सकते. हमने उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा है. उनके चित्रों के बारे में कुछ लोग कहेंगे कि ये ग़लत है, हम इसको सहन नहीं कर सकते, ये हमारी इज़्जत के ख़िलाफ़ हैं, वगैरह वगैरह... '' क्या यह व्यवहार समाज़ में बढती असहिष्णुता का परिचायक है? भारत के मज़बूत लोकतंत्र और सबके स्वतंत्र माहौल और खुलकर सांस लेने के अधिकार को यह घटना छलनी करती है ? मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले जानेमाने वक़ील प्रशांत भूषण कहते हैं, "तस्लीमा के साथ जो किया जा रहा है, बिल्कुल ही ग़लत है. यह हर तरह की असहिष्णुता और एक तरह की दादागिरी दिखाता है. कई लोग इसे इस्लामिक चरमपंथ वगैरह कह रहें हैं." वहीं इदरिस अली जैसे नेता कहते हैं, "भारत सरकार और राज्य सरकारों को सोचना चाहिए कि वे किसे अपने राज्य और देश में रखना चाहते हैं? क्या जनता ऐसा चाहती हैं? क्या एक विदेशी देश में आकर जो कुछ लिखता बोलता है, उसका असर यदि क़ानून और व्यवस्था पर पड़ता है तो क्या उसे देश से बाहर नहीं किया जाना चाहिए?" दक्षिणपंथी और वामपंथी अभी तक दक्षिणपंथी संगठनों पर आरोप लगते थे कि वे हर उस मत को सुनना नहीं चाहते जो उनके मनके मुताबिक न हो. वहीं वामदलों की उदार बुद्धिजीवी होने की छवि रही है. पर अब क्या ये सब बदल गया है? रामचंद्र गुहा कहते है, "कोई भी हमला करने वाले और चिल्लाने वालों को सज़ा न दी जाए तो यह तो बढता ही जाएगा. गुजरात के एमएस विश्वविद्यालय में यही सब हुआ. पूरे विश्व में मशहूर कला विभाग को बंद कर दिया गया. क्योंकि आरएसएस के कुछ नेताओं को उनका काम पसंद नहीं आता." वे कहते हैं, ''ऐसे में हम अपने समाज़ और लोकतंत्र को कैसे चला पाएंगे? हमें यह सोचना चाहिए. एक समय हम सोचते थे कि ऐसा केवल अतिवादी दल करते हैं लेकिन सीपीएम ने भी ऐसा कर दिखाया है. उन्होंने भी बहुत कमज़ोरी दिखाई. कह दिया कि हम तस्लीमा को राज्य में नहीं रख सकते हैं." एक सवाल यह भी है कि कोलकाता की सड़कों पर जो विरोध था, वह तस्लीमा के ख़िलाफ़ था या नंदीग्राम में मुसलमानों पर हुई हिंसा की छाया उस पर थी. या फिर रिज़वानुर रहमान की एक हिंदु युवती से विवाह के बाद संदेहास्पद स्थिती में मौत और पुलिस की संदिग्ध भूमिका के जवाब में था. इस बारे में वकील प्रशांत भूषण कहते हैं, "यदि राज्य ही अपने लोगों पर हमला करने लगे, तो इसका नतीज़ा यह होता है कि पीड़ितों में ज़बावी हिंसा पैदा होती है. इसका परिणाम यह होगा कि देश में हिंसा, असहिष्णुता और चरमपंथ बढेगा. " पुणे के भंडारकर संस्थान में शिवाजी पर लिखी पुस्तक को लेकर तोड़फोड़ हो या फिर वडोदरा के सुप्रसिद्ध एमएस विश्वविद्यालय में एक छात्र द्वारा बनाई कलाकृतियों पर विवाद हो, या हैदराबाद में तस्लीमा नसरीन पर हुआ हमला या फिर कोलकाता का घटनाक्रम, ये सभी दर्शाते हैं कि लोकतंत्र में राजनीतिक नफ़ा-नुकसान किस तरह अहम होता जा रहा है. भारत के संविधान में जिन आदर्शो पर चलने का लक्ष्य रखा गया था, क्या उस पर असहिष्णुता की दीमक लग गई है और धर्म, समुदाय, जातपात ने समाज़ और सरकार पर अपनी पकङ़ मज़बूत कर ली है? हम सभी के लिए यह सोचने का विषय है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अपना दूसरा घर छोड़कर कहाँ जाऊँ?' 19 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस तस्लीमा नसरीन को जयपुर ले जाया गया22 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस रिज़वान की मौत की जाँच सीबीआई को16 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस कोलकाता में रहना चाहती हैं तसलीमा30 अप्रैल, 2002 | पहला पन्ना तस्लीमा को क़ैद की सज़ा14 अक्तूबर, 2002 | पहला पन्ना तस्लीमा के उपन्यास पर प्रतिबंध27 अगस्त, 2002 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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