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वाघा सीमा पर जनरल अटारी की प्रतिमा

जनरल श्याम सिंह अटारी
जनरल श्याम सिंह अटारी प्रसिद्ध योद्दा थे जिन्होनें ब्रिटिश हुकूमत से जम कर लड़ाई लड़ी
रियासत काल में महाराजा रंजीत सिंह के प्रमुख सिपहसालार रहे जनरल श्याम सिंह अटारी की 21 फुट ऊँची प्रतिमा को जयपुर में अंतिम रूप दिया जा रहा है. इस प्रतिमा को दो महीने बाद भारत-पाक सीमा पर अटारी में स्थापित किया जाएगा.

यह एक ऐसे उपेक्षित भारतीय योद्धा की प्रतिमा होगी जिसने पंजाब की और्सी, मुल्तान, कश्मीर और सीमांत प्रांत मे कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया था. जनरल अटारी इतिहास की एक भूली बिसरी याद बन कर रह गए.

उनके परिजन कैप्टन हरेंदर सिंह ने बीबीसी को बताया की जनरल अटारी की प्रतिमा लगवाने के लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. उन्हें इस अभियान मे क़रीब दस साल लगे. पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री अमरिन्दर सिंह ने इसे मंजूरी दी थी.

 ये प्रतिमा जब लगेगी तो हमें बहुत ही खुशी होगी, हम उनकी याद को सदा जीवित रखना चाहते हैं
जनरल अटारी के परिजन, कैप्टन हरेंद्र सिंह

जनरल अटारी ब्रिटिश हुकूमत से जम कर लड़े और ऐसी ही एक लड़ाई मे 1846 में उन्होंने सतलज नदी के किनारे ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए अंतिम साँस ली.

अश्वारोही अटारी की इस प्रतिमा को बनाने के लिए 15 सिद्दहस्त कलाकारों ने लगभग साल भर काम किया. इस प्रतिमा को अब भारत पाक सीमा के नज़दीक जीटी रोड पर स्थापित किया जाएगा.

'प्रतिमा के लिए संघर्ष'

इस मूर्ति में प्राण फुँकने मे लगे लक्ष्मण व्यास का कहते हैं, "ये मेरे लिए अभिमान की बात है. क्योंकि ये कदाचित सबसे ऊँची ऐसी मूर्ति होगी. हमें खुशी है कि इस मूर्ति को दोनों देशों के लोग देखेंगे. इस काम को हमने बहुत मन लगा कर किया है."

प्रतिमा को आकार देने मे लगे महावीर भारती कहते हैं, "हमने इस महान योद्धा के परिधान, चेहरा, आभूषण और घोडे़ को बहुत ध्यान से बनाया है. मूर्ति का वज़न लगभग तीन टन है."

हरेंदर सिंह कहते हैं, ''ये प्रतिमा जब लगेगी तो हमें बहुत ही खुशी होगी, हम उनकी याद को सदा जीवित रखना चाहते हैं."

 हमने इस महान योद्धा के परिधान, चेहरा, आभूषण और घोडे़ को बहुत ध्यान से बनाया है. मूर्ति का वज़न लगभग तीन टन है
महावीर भारती, मूर्तिकार

श्री सिंह ने बताया कि अटारी का वो किला ख़राब हालत मे है जहाँ उनके पुरखे रहते थे.
साथ ही वो भवन अब नही है जहाँ जनरल अटारी रहे थे. यह एक पांच मंजिला इमारत थी जहाँ से लाहौर के कारख़ाने दिखते थे.

उन्होनें कहा कि उनकी कोशिश होगी कि वहाँ ऐसी ही एक इमारत बने जिससे वही पुराना मंज़र दिखे.

अटारी वाघा से महज दो किलोमीटर दूर है और यहीं पर जनरल अटारी ने जन्म लिया था. यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है की जनरल अटारी के पुरखे राजस्थान के जैसलमेर से कभी पंजाब जा बसे थे.

अटारी मे हर साल 10 फरवरी को जनरल अटारी का शहादत दिवस मनाया जाता है. शायद अगले साल जब ये समारोह होगा तो इस अवसर पर उनकी प्रतिमा वहाँ शोभा बढ़ाने के लिए मौज़ूद रहेगी.

जनरल अटारी ने अपनी मातृभूमि के लिए बहुत संघर्ष किया, लेकिन आज़ाद भारत में उनके परिजनों को भी उनकी प्रतिमा लगाने के लिए संघर्ष करना पड़ा.

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