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रामसेतु: आस्था बनाम विकास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु के दक्षिणी किनारे पर स्थित द्वीप रामेश्वरम के समुद्र तट पर पूरी दुनिया से श्रद्धालु स्नान करने आए हैं. वे पूजा करने और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए मुट्ठी भर चावलों और फल-सब्जियों पर हल्दी छिड़कते हैं. नज़दीक स्थित मंदिर के अंदर 22 कुएँ हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि यह कुएँ प्रभु राम के तीर चलाने से ही बने थे. हिंदू का धार्मिक ग्रंथ रामायण बताता है कि कैसे राम यहाँ भ्रमण के लिए आए और कैसे उन्होंने रावण से युद्ध करने के लिए सतु यानी पुल बनाकर समुद्र पार किया. अब राष्ट्रीय और तमिलनाडु सरकार के रामसेतु के ठीक बीच से जाने वाली एक नहर बना कर जहाज़ों के आने-जाने का रास्ता बनाने का प्रस्ताव इस सेतु के लिए ख़तरा बन गया है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह सेतु राम ने बनवाया था. बहुत लोगों के लिए यह पवित्रता का अनादर है. कमर तक पानी में खड़े स्वयंप्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं, “यह हमारा विश्वास और हमारी परम्परा है.” वे कहते हैं, “सिर्फ़ मैं ही नहीं, लाखों लोग प्रभु राम में विश्वास रखते हैं. मैं उनके ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता.” पूर्णतया ग़लत रामजी प्रजापति कहते हैं, “यह सेतु प्रभु राम ने ही बनवाया था. यह हमारे हिंदू धर्म का हिस्सा है. इसे तोड़ने की कोशिश करना हमारे समाज के विश्वास और आस्था पर हमला करने जैसा है. यह पूर्णतया ग़लत है. ” इस छोटे से द्वीप पर राम के अनेक मंदिर हैं. इनमें से एक में पानी में तैरने वाला एक पत्थर रखा है. कहा जाता है कि इसी तरह के पत्थरों से राम ने सेतु बनाया था. लेकिन सेतुसमुद्रम परियोजना के समर्थक इसे मानने से इनकार करते हैं. स्थानीय सांसद भवानी राजेंद्रन कहती हैं, “यह परियोजना सबसे पहले हिंदुओं की राष्ट्रीय पार्टी कही जाने वाली भाजपा सरकार ने ही स्वीकृत की थी, जो आज इसका इतना मुखर विरोध कर रही है.” वे कहती हैं, “वहॉ कोई मानव निर्मित सेतु नहीं है जहॉ इसे साबित करने की कोशिश की जा रही है.”
उनके अनुसार, “हमें अपने देश के विकास और इसके अर्थतंत्र पर ध्यान देना चाहिए. इस परियोजना को बिना देरी के अमल में लाना चाहिए.” आंदोलन हम इस जगह का नज़ारा लेने के लिए स्थानीय मछुआरों के साथ एक छोटी सी नौका में बैठे थे. जहाजों के लिए नहर बनाने के विरोधियों ने इसके विरोध में एक पूरा राष्ट्रीय आंदोलन ही छेड़ दिया है. धार्मिक संगठन इससे गहरे जुड़ गए हैं. उन्होंने इससे जुड़ी आर्थिक और पर्यावरणीय आपत्तियाँ भी तैयार कर ली हैं. लेकिन मछुआरों को इससे कोई ख़ास लेना-देना नहीं है. राजा कहते हैं, “अगर यहां से होकर जहाज़ जाएँगे तो भी हम अपना काम कर सकेंगे और इसका हम पर कोई असर नहीं होगा.” वे कहते हैं, “तब हम भी एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए इस नहर का प्रयोग कर सकते हैं. और गहरी नहर में तो हमें और भी ज़्यादा मछलियाँ मिल सकती हैं.” हमारी नौका अब भारतीय किनारे से एक मील दूरी पर एक छोटे से रेतीले किनारे पर पहुँच गई. हमारे सामने करीब 20 मील की दूरी पर श्रीलंका का उत्तरी छोर है. और बीच में विवादों की जड़ यानी बालू से बने छोटे-छोटे द्वीपों की कतार है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रेत के जमने और ज्वार-भाटा के कारण बने हैं.
लेकिन श्रद्धालुओं अड़े हैं कि यह उस पुल का हिस्सा हैं जिन्हें 'प्रभु राम ने अपनी वानर सेना की मदद से तैयार किया था'. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी कहते हैं, “यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई यह नहीं पूछ सकता कि जीसस क्राइस्ट एक कुँवारी के गर्भ से पैदा हुए थे या नहीं. यह आस्था का मामला है.” वे कहते हैं, "इसी तरह कोई यह प्रश्न नहीं कर सकता कि यह पुल प्रभु राम ने ही बनवाया था या नहीं. यह पूछने की बात नहीं है." राजनीति और धर्म भाजपा इन आरोपों को नकारती है कि वह अपने राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझ कर लोगों की भावनाओं को भुनाने की कोशिश कर रही है. इसकी जॉच तो तभी होगी जब इस महीने के अंत में जहाजों के लिए बनाई जाने वाली नहर की औपचारिक रिपोर्ट आएगी. ज़्यादातर पर्यवेक्षकों को उम्मीद है कि इस परियोजना को अनुमति मिल जाएगी. यह पहली बार नहीं है जब भगवान राम विवादों के जरिये भारत की राजनीति में आए हों. पंद्रह साल पहले, दक्षिणपंथी हिंदुओं ने उत्तर भारत स्थित अयोध्या की बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया था. उनका कहना था कि इसे राम के जन्मस्थान पर बनाया गया था. इसके बाद भारत के कई हिस्सों में दंगे हुए और फिर आने वाले सालों में दंगों का बदला लेने के लिए कई बम हमले भी हुए. भारत अब भी इसके नतीजे भुगत रहा है. यह तो मुश्किल है कि ऐसे हादसे फिर दोहराए जाएँ लेकिन यह अब भी गंभीर मुद्दे हैं. जब हमारी नौका भारत की ज़मीन पर लौटी, श्रद्धालुओं की भीड़ पवित्र सेतु के सबसे नज़दीक पहुँच सकने वाले रेतीले तट पर जमा थी. इस सेतु को बचाना एक ऐसा मुद्दा है जिस पर श्रद्धालु शायद कभी समझौता नहीं करेंगे. लगता है कि इससे कानूनी चुनौतियॉ बढ़ेंगीं और जनविरोध बढ़ेगा. |
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