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'रामसेतु' का हलफ़नामा वापस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के केंद्र सरकार ने 'राम-सेतु' पर सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफ़नामा को वापस ले लिया है. नया हलफ़नामा पेश करने के लिए सरकार ने तीन महीने का समय माँगा है. अदालत ने इसकी अनुमति देते हुए कहा है कि मामले की अगली सुनवाई अब जनवरी में होगी. अदालत ने कहा है कि तब तक राम-सेतु के आसपास निर्माण कार्य पर लगी रोक जारी रहेगी. अदालत ने परियोजना पर कोई नई रोक नहीं लगाई है. उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफ़नामा में कहा था कि 'राम-सेतु' के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं. इसके बाद राजनीतिक भूचाल खड़ा हो गया था और कई हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे आस्था पर चोट क़रार दिया था. भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी से देश से माफ़ी माँगने की माँग की थी. लेकिन यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा था कि सरकार किसी की आस्था को चोट नहीं पहुँचाना चाहती और वह इस हलफ़नामे को वापस लेकर नया हलफ़नामा दाखिल करेगी. दरअसल भारत और श्रीलंका के बीच भारत सरकार सेतु समुद्रम परियोजना पर काम कर रही है. इसके तहत दोनों देशों के बीच उथले समुद्र को गहरा करके जहाज़ों के आने जाने का रास्ता बनाना है. इसके तहत उस संरचना को भी तोड़ा जाना है जो हवाई चित्रों में पुल की तरह दिखाई देता है. हिंदू संगठनों का कहना है कि यह 'राम-सेतु' है जिसका ज़िक्र रामायण में है. कुछ पर्यावरणविद भी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं कि इससे पर्यावरणीय असंतुलन होगा. हलफ़नामा वापस सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले दो सदस्यीय पीठ के सामने केंद्र सरकार के वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने एएसआई की याचिका वापस लेने का अनुरोध किया.
उन्होंने कहा, "हम किसी समुदाय की भावनाएँ आहत नहीं करना चाहते और न ही किसी धर्मावलंबी की आस्था पर चोट करना चाहते हैं." सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट से नया हलफ़नामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय माँगा है. सरकार ने अपनी ओर से कहा है कि वह एक ऐसी मशीनरी स्थापित करेगी जो सभी संबंधित पक्षों से बात करे और फिर सभी की भावनाओं को ध्यान में रखकर नया हलफ़नामा तैयार करे. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का अनुरोध स्वीकार करते हुए कहा है कि इस मामले की सुनवाई अब जनवरी में होगी. कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं वह इस बात का इंतज़ाम करे कि यदि कोई याचिकाकर्ता इस बीच सरकार के दस्तावेज़ों के पुराने संग्रह से कोई सामग्री देखना चाहे तो वह उसे उपलब्ध हो. 'वैज्ञानिक आधार नहीं' एएसआई के निदेशक (स्मारक) सी. दोरजी की ओर से दायर किए गए शपथ पत्र में कहा गया था कि 'एडम्स ब्रिज' को लेकर ऐसे कोई प्रमाण कभी नहीं मिले जिससे एएसआई को इसका सर्वेक्षण करने की ज़रुरत महसूस हुई हो.
एएसआई ने अपने जवाब में कहा है कि रामायण एक मिथकीय कथा है जिसका आधार वाल्मिकी रामायण और रामचरित मानस है. ऐसा कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है जिससे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रुप से इस कथा के प्रामाणिक होने और इस कथा के पात्रों के होने का प्रमाण मिलता हो. इसी रामायण कथा को आधार बनाकर हिंदू संगठन कह रहे हैं कि 'एडम्स ब्रिज' दरअसल रामसेतु है और इसका निर्माण भगवान राम ने वानरों की मदद से किया था. भारत सरकार ने यहाँ सेतु समुद्रम नाम की एक परियोजना शुरु की है जिसके तहत भारत और श्रीलंका के बीच जहाज़ों के आने जाने के लिए एक रास्ता बनाया जाना है. इस परियोजना के पूरा होने के बाद भारत के पूर्वी भाग से पश्चिमी भाग तक जाने के लिए जहाज़ों को श्रीलंका का चक्कर नहीं काटना पड़ेगा. सरकार का कहना है कि इससे क्षेत्र में व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और आवागमन सुलभ हो सकेगा. |
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