|
जब मौत ने दस्तक दी... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असदुल्लाह नूरज़े एक अफ़ग़ान सैनिक हैं जो काबुल में तैनात हैं. वह छुट्टियाँ बिताने के लिए अपने माता-पिता के पास बग़लान गए हुए थे तभी उन्होंने देखा कि मौत किस तरह अचानक दस्तक देती है. असदुल्लाह नूरज़े ने मंगलवार, छह नवंबर 2007 को बग़लान की एक चीनी फ़ैक्टरी में हुए आत्मघाती हमले का दृश्य अपनी आँखों से देखा. इस हमले को अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास में सबसे भीषण आत्मघाती हमलों में से एक माना जा रहा है जिसमें लगभग 40 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए. असदुल्लाह नूरज़े उस भयावह हादसे को कुछ इस तरह बयान करते हैं... "मैं कुछ राशन ख़रीदने के लिए बाज़ार जा रहा था लेकिन मुझे उस स्थान पर रुकना पड़ा जहाँ उदघाटन समारोह हो रहा था और बहुत से लोग इकट्ठा थे जिनमें बच्चे, सांसद, पत्रकार और स्थानीय लोग थे. कुछ औरतें भी थीं. बच्चों में कुछ ऐसे भी थे जो स्कूल जाने वाले थे. सड़क यातायात की हालत बहुत ख़राब थी इसलिए मैंने भी सोचा कि चलो कुछ देर रुककर इस समारोह का भी मज़ा ले लेते हैं जहाँ फैक्टरी को चलाने के लिए रिबन काटा जा रहा था. बस तभी धमाके की ज़ोरदार आवाज़ आई जो कान के पर्दे फाड़ने जैसी थी. विस्फोट के समय और बाद में मैंने वहाँ जो कुछ देखा, उसे बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. कुछ देर के लिए तो यक़ीन ही नहीं आया कि मौत इस तरह का खेल भी खेल सकती है. पलक झपकते ही नज़ारा बिल्कुल बदल चुका था. कुछ लम्हे पहले जहाँ ज़िंदगी मुस्कुरा रही थी, अब वहाँ चारों तरफ़ मौत के निशान नज़र आ रहे थे.
यहाँ-वहाँ लोगों की लाशें बिखरी पड़ी थीं, कुछ ऐसी जिनकी शिनाख़्त करना भी मुश्किल. ज़मीन पर ख़ून ही ख़ून नज़र आ रहा था. विस्फोट इतना भीषण था कि उसने बहुत से लोगों के शरीर कई हिस्सों में बाँट दिए थे. ये सब देखकर मुझे भारी सदमा पहुँचा और कुछ देर के लिए तो मैं बिल्कुल हक्का-बक्का रह गया, कुछ समझ में ही नहीं आया. पता नहीं मेरी ख़ामोशी कब टूटी. मुझे यक़ीन ही नहीं आया कि ये सब मैं अपनी आँखों से देख रहा हूँ और यह कोई सपना नहीं, ज़मीन पर जीती-जागती सच्चाई है जिसने मानवता को हिलाकर रख दिया. मुझे कुछ होश आया तो मैंने देखा कि ख़ुद मैं भी ख़ून में तर हो चुका था. मुझे भी अन्य घायल लोगों के साथ-साथ अस्पताल पहुँचाया गया. पहले तो मुझे लगा कि ख़ुद मैं काफ़ी ज़ख़्मी हो चुका हूँ लेकिन जल्दी ही पता चला कि वो मेरा अपना ख़ून नहीं था. मुझे ज़्यादा चोट नहीं आई थी और अस्पताल ने मुझे प्राथमिक चिकित्सा के बाद ही घर जाने की इजाज़त दे दी थी. घर जाते वक़्त मैं सारे रास्ते बस यही सोचता रहा कि मैं कितना ख़ुशक़िस्मत हूँ कि जिस मुक़ाम पर मौत ने दस्तक दी और मैं वहाँ से सही सलामत बच आया. मैंने समाचारों में सुना कि उस विस्फोट में कम से कम 40 लोगों की जान चली गई लेकिन मारे गए लोगों की संख्या निश्चित रूप से उससे कहीं ज़्यादा थी. पहले तो मैंने सोचा कि इस हमले के पीछे तालेबान का हाथ होगा लेकिन उन्होंने खंडन किया कि इस हमले में उनका कोई हाथ नहीं था और मुझे उनके कहे पर भरोसा भी है क्योंकि इससे पहले जो भी आत्मघाती हमले हुए हैं उनकी ज़िम्मेदारी तालेबान ने स्वीकार की है. मैं नहीं जानता कि इस हमले के लिए कौन ज़िम्मेदार है क्योंकि यह राजनीतिक मामला है जो मेरी समझ से बाहर है.
बग़लान प्रांत में यह पहला आत्मघाती हमला है और स्थानीय लोगों को अब चिंता सता रही है कि इस तरह के आत्मघाती हमले आगे और भी हो सकते हैं. इन लोगों ने राष्ट्रपति हामिद करज़ई से ख़ास गुज़ारिश की है कि इस आत्मघाती हमले की जाँच के लिए एक विशेष टीम भेजी जाए और पता लगाया जाए कि इसके पीछे आख़िर किसका हाथ है. मैं एक सिपाही हूँ और मैंने इससे पहले भी मौत को काफ़ी क़रीब से देखा है. पिछली गर्मियों में ही मैंने एक आत्मघाती हमला देखा था और उसमें मेरी जान बच गई थी. हम जिस ट्रक में सवार थे, उसके बिल्कुल सामने एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को बमों से उड़ा दिया था. उसने तो अपनी जान दी ही, मेरे तीन साथी सैनिक भी ज़ख़्मी हो गए थे लेकिन इस घटना का उससे कोई मुक़ाबला नहीं हो सकता जो मैंने बग़लान में देखा. इसने मुझे इराक़ की याद दिला दी जहाँ लगभग हर रोज़ इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं जहाँ किसी एक हमले में ही सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है. मुझे पूरी उम्मीद है कि अफ़ग़ानिस्तान में इराक़ जैसे हालात नहीं होंगे. " | इससे जुड़ी ख़बरें आत्मघाती हमले में 40 की मौत06 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस क़ुरान के अनुवाद पर विवाद04 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नैटो को और संसाधन मिलेंगे25 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस हवाई हमले में '13 नागरिक' मारे गए23 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ानिस्तान में बम हमला, नौ मारे गए14 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'अफ़ग़ान नागरिकों की मौत का अफ़सोस'07 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस काबुल में आत्मघाती हमला, छह मरे06 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ानिस्तान में बीस 'चरमपंथी' मारे गए01 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||