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वामपंथी और तीसरा मोर्चा एकजुट हुआ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका असैनिक परमाणु करार के विरोध के मामले में अब तीसरा मोर्चा यानी यूएनपीए भी वामदलों के सुर में सुर मिला रहा है. यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (यूनपीए) के नवनियुक्त अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने गुरूवार को वामदलों के नेताओ से मुलाकात की. समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह ने पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत से मुलाकात की, उसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) नेता एबी बर्धन से मिलने पहुँचे. इन दोनों ही मुलाक़ातों मे मुलायम सिंह ने वाम नेताओ को ये बताया कि परमाणु करार मुद्दे पर वे वामदलो के विचार से सहमत हैं. उल्लेखनीय है कि वामदल, कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की यूनाईटेड प्रोग्रेसिव एलायंस यानी (यूपीए) सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं, लेकिन परमाणु करार पर वो सरकार को और आगे न बढ़ने की चेतावनी दे चुके हैं. करार पर तकरार बैठक के बाद मुलायम सिह ने पत्रकारो से कहा, "परमाणु मुद्दे पर हम सभी की एक राय हैं और ये सवाल किसी दल विशेष का नहीं बल्कि देश का है". उन्होंने इस समझौते को भारत की संप्रभुता पर खतरा बताया. इससे पहले गत 22 अक्टूबर को दिल्ली में यूपीए और वामदलों की बैठक के बाद प्रकाश कारत समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह से मिलने पहुँचे थे. जिसके बाद यूएनपीए की बैठक हुई थी.
इस बैठक में इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओमप्रकाश चौटाला और तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) के चंद्रबाबू नायडू शामिल हुए थे. हालांकि बैठक में आठ दलों वाले यूएनपीए के कई सदस्य शामिल नहीं हुए थे. साफ है कि इन सभी नेताओ का एक मंच पर आना एक रणनीति के तहत था. जहाँ ये पार्टियाँ ससंद के आगामी शीतकालीन सत्र मे परमाणु मुद्दे पर बहस के लिए सरकार पर दबाव डालने के लिए एक जुट हुए वही आम चुनाव के लिए भी कमर कस रहे थे. परमाणु मुद्दे पर सत्ताधारी गठबंधन और वामपंथी दलों की अगली बैठक 16 नवंबर को होनी है और 22 अक्तूबर की बैठक मे निर्णय लिया गया था कि संयुक्त समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही आगे फैसला लिया जाएगा. राजनीतिक दल जानते हैं कि परमाणु मसले पर चुनाव लड़कर जीत हासिल करना किसी भी पार्टी के लिए मुमकिन नही है. हालाँकि वामपंथी और तीसरे मोर्चे के रुख पर काँग्रेस का कहना है कि वह न तो चकित है और न ही उसे कोई खतरा है. पर जानकार इस गठजोड़ को सरकार के घावों पर नमक छिड़कने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'विकास के दुश्मन हैं क़रार के विरोधी'07 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस विवादों के बीच अल बारादई की यात्रा09 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस बयानों में नरमी से वामपंथी उत्साहित12 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस क्या यह मनमोहन-सोनिया की हार है?13 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका परमाणु समझौते का भविष्य..?23 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'समझौते पर 2008 तक अमल हो जाए'16 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु क़रार पर अहम बैठक21 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु क़रार पर बातचीत की नई तारीख़22 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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