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'इस्तीफ़ा माँगने का हक़ नहीं भाजपा को' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा देने की माँग कर रहे भारतीय जनता पार्टी को दो टूक जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि उसे इसका हक़ नहीं है. उन्होंने कहा कि शासन करने के लिए नैतिक आधार का अगर सवाल है तो सभी राजनीतिक दलों में भाजपा सबसे कम योग्य है. उन्होंने भाजपा पर राजनीतिक हमला करते हुए गुजरात में हुए दंगों से लेकर पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ आगरा शिखर सम्मेलन के विफल हो जाने और कारगिल युद्ध के लिए भाजपा को सीधे दोषी ठहराया. उल्लेखनीय है कि अमरीका और भारत के बीच 'परमाणु समझौता विफल' हो जाने को आधार बनाकर भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफ़े की माँग की है. हालांकि मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि समझौता अभी ख़त्म नहीं हुआ है और वे इसे लेकर 'सार्थक सहमति' बन जाने की उम्मीद कर रहे हैं. भाजपा पर निशाना दो अफ़्रीकी देशों की यात्रा से लौट रहे प्रधानमंत्री ने विमान में पत्रकारों से हुई बातचीत में भाजपा पर सीधे हमले किए. उन्होंने गुजरात के दंगों की तुलना जर्मनी के 'होलोकास्ट' से करते हुए कहा, "जब गुजरात में होलोकास्ट हो रहा था तो एलके आडवाणी गृहमंत्री थे और उन्होंने गुजरात सरकार को सर्टिफ़िकेट दिया था." समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार उन्होंने कहा, "जब भाजपा शासन के दौरान गुजरात में जनसंहार हुआ तब उन्होंने नैतिक आधार पर शासन छोड़ने के बारे में नहीं सोचा." प्रधानमंत्री ने 2001 के आगरा शिखर सम्मेलन का ज़िक्र किया और 1999 में कारगिल युद्ध का भी जब एनडीए सरकार सत्ता संभाल रही थी. उन्होंने कहा, "जब कारगिल में घुसपैठ हो रही थी तो सरकार सो रही थी. इसलिए मैं समझता हूँ कि नैतिक की बात करने का भाजपा को सबसे कम अधिकार है." समझौते की दिक़्क़तें परमाणु समझौते पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "मैं कह चुका हूँ कि समझौते को लेकर कुछ समस्याएँ हैं. हम गठबंधन में हैं और हमें रास्ता निकालना होगा." प्रधानमंत्री के साथ यात्रा कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती के अनुसार प्रधानमंत्री ने इस बार वामपंथी दलों पर कोई हमला नहीं किया लेकिन परोक्ष रुप से उन्होंने यूपीए में शामिल सहयोगी दलों को आड़े हाथों लिया. सहयोगी दलों का नाम लिए बिना मनमोहन सिंह ने कहा कि जब परमाणु समझौते को मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दी थी और जब इसे राजनीतिक मसलों की समिति ने स्वीकार किया था तो सभी दलों के सदस्य वहाँ मौजूद थे. ज़ाहिर है कि उनका इशारा उन दलों की ओर था जो अब परमाणु समझौते पर सवाल खड़े कर रहे हैं. यह पूछने पर कि जो कुछ हुआ उसका असर उनकी छवि और काम पर पड़ेगा तो उन्होंने कहा, "जब कोई काम योजना के अनुसार नहीं होता तो थोड़ा तो असर पड़ता ही है." उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में कुछ अनिश्चितताएँ होती ही हैं. और इस सवाल पर कि क्या अब उनका मन प्रधानमंत्री पद से भर गया है, उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि वे गीता से प्रेरणा लेते हैं और बिना फल की चिंता किए काम करने में भरोसा रखते हैं. सीमा चिश्ती का आकलन है कि प्रधानमंत्री ने परमाणु समझौते के मामले को ठंडा करने या उसकी हवा निकालने की कोशिश की है और यूपीए-एनडीए के बीच एक साफ़ लकीर खींचने का प्रयास किया है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'मनमोहन की कमज़ोरी ही उनकी ताकत'18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'सार्थक सहमति बनाने की कोशिशें जारी'17 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'समझौते पर 2008 तक अमल हो जाए'16 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'परमाणु समझौता लागू करने में परेशानी'15 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री'13 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु समझौते पर बैठक फिर बेनतीजा09 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस सोनिया के बयान से भड़के वामपंथी08 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'विकास के दुश्मन हैं क़रार के विरोधी'07 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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