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'मनमोहन की कमज़ोरी ही उनकी ताकत' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश में मध्यावधि चुनाव की आशंकाओं के टलने के पीछे न तो कांग्रेस का डर है और न ही सेतुसमुद्रम विवाद को लेकर सहयोगियों के वोटों की चिंता. ये मानना है राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का, जो कहते हैं कि यूपीए के तीन बड़े क्षत्रप इस वक़्त चुनाव के लिए तैयार नहीं थे और सरकार उनके दबाव में आ गई. योगेंद्र यादव ने बीबीसी हिन्दी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'आपकी बात, बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए ये विचार व्यक्त किए. परमाणु क़रार पर सरकार के पीछे हटने की वजह से सरकार, कांग्रेस और प्रधानमंत्री की छवि को लेकर कार्यक्रम में कई सवाल उठाए गए. घरेलू मोर्चे पर छवि धूमिल यादव ने कहा कि क़रार से पीछे हटने का नुकसान अंतरराष्ट्रीय मोर्चे से ज़्यादा घरेलू राजनीति पर हुआ है. प्रधानमंत्री और कांग्रेस की छवि कमज़ोर हुई है. उनका कहना था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के फ़ैसलों में दख़ल को लेकर विपक्ष के आरोपों की पुष्टि हुई है. वे कहते हैं कि सरकार ने जिस दौर में क़रार को ठंडे बस्ते में डाला है, उससे नहीं लगता कि यह फ़ैसला किसी नए तथ्य के आधार पर हुआ है. यादव ने कहा कि लोगों को यही लग रहा है कि सरकार कमज़ोर है, दबाव में आ गई है, निर्णय नहीं ले सकती और चुनाव से डर गई है. बदले हालात में पार्टी और सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रभाव पर योगेंद्र यादव का मानना है, "मनमोहन ऐसे नेता हैं जिनकी कमज़ोरी ही उनकी ताक़त है. अगर वे कमज़ोर नहीं होते तो देश के प्रधानमंत्री नहीं होते. कमज़ोर होने के कारण ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को उन पर भरोसा है." यादव ने कहा कि परमाणु सहमति पर प्रधानमंत्री ने पहला इंटरव्यू आलाकमान की सहमति से ही दिया था और जब वे क़रार की बजाय सरकार चुनने की बात कह रहे थे, तब भी उन्हें आलाकमान की सहमति हासिल थी. इसलिए पार्टी में मनमोहन सिंह की छवि को नुकसान नहीं हुआ है. चुनाव में प्रधानमंत्री की छवि का पार्टी के प्रदर्शन पर असर होने के सवाल पर यादव का कहना रहा कि कांग्रेस चुनाव सोनिया गांधी और गांधी परिवार के दम पर लड़ती है. वे कहते हैं कि ख़ुद मनमोहन सिंह ने भी कभी नहीं कहा है कि पार्टी अगला चुनाव उनके दम पर लड़ेगी. अनेक श्रोताओं ने दूसरे देशों में नीतिगत मसलों पर इतने बड़े 'यू-टर्न' की हालत में प्रधानमंत्री के इस्तीफ़ा देने का हवाला दिया और प्रधानमंत्री मनमोहन के पद छोड़ने पर भी सवाल उठे. यादव ने कहा कि यह विशेष परिस्थिति है जिसमें देश का प्रधानमंत्री देश का सबसे बड़ा राजनैतिक नेता नहीं है. वे कभी ऐसा दावा भी नहीं करते हैं. इसलिए व्यक्तिगत तौर पर उन्हें क़रार से पीछे हटना का दोषी नहीं माना जा सकता. 'वामदलों को न भांपना बड़ी भूल' विदेश नीति को लेकर बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों की चुप्पी पर योगेंद्र यादव ने कहा कि यह सही है कि देश की कई पार्टियाँ विदेश नीति पर चुप हैं. उनका मानना था कि इसका कारण है कि विदेश नीति भारत में चुनावी मुद्दा नहीं बनती. यादव ने कहा कि ऊर्जा ज़रूरतों पर वामदल और कांग्रेस अलग सोच नहीं रखते लेकिन अमरीका विरोध को लेकर वामदलों का रुख़ स्पष्ट है. उनका कहना था कि क़रार को लेकर लेफ़्ट को सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि यह मदद अमरीका से ली जाएगी. यादव ने कहा कि कांग्रेस और सरकार ने वामदलों का रुख़ भांपने, समझने और उसका दीर्घकालिक असर देखने में बड़ी भूल की है. क्षत्रपों का दबाव सेतुसमुद्रम विवाद को लेकर यादव ने कहा कि इस मसले पर मर्यादाविहीनता ही देखने को मिली है. उन्होंने कहा कि क्या सरकार, क्या विपक्ष सभी राम को लेकर अमर्यादित बातें कर रहे हैं. मध्यावधि चुनाव टलने के पीछे यादव सेतुसमुद्रम विवाद को कोई अहम कारण नहीं मानते हैं. उनका कहना है कि बिहार में लालू प्रसाद, तमिलनाडु में करूणानिधि और महाराष्ट्र में शरद पवार इस समय चुनाव के लिए तैयार नहीं थे और सरकार पर इनलोगों का दबाव काम कर गया. | इससे जुड़ी ख़बरें यह भारत का आंतरिक मामला है: अमरीका16 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस नाइजीरिया के अहम दौरे पर मनमोहन14 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री'13 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु ऊर्जा देश के लिए ज़रूरी:मनमोहन20 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस बुश ने मनमोहन सिंह से बात की14 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'समर्थन वापस लेना चाहते हैं, तो ले लें'11 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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