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गुरुवार, 20 सितंबर, 2007 को 13:41 GMT तक के समाचार
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पूर्वांचल में सक्रिय हैं जिस्म के दलाल

संहला टुड्डु
संहला टुड्डु की बड़ी बेटी जिस्म के सौदागरों के जाल में फँस गई
जवानी की दहलीज़ पर क़दम रख चुकी दोनो बेटियों को देख कर संहला टुड्डू के शरीर में डर के मारे कंपकपी उठने लगती है. संहला को भय है कि उनकी ये दोनों बेटियाँ भी कहीं बड़ी बेटी पूको टुड्डू की तरह जिस्म के सौदागरों के शिकंजे में न चली जाएँ.

पूको टुड्डू को दस वर्ष पहले अच्छी नौकरी और सुखी जीवन का सपना दिखाकर कुछ लोग साथ ले गए थे, लेकिन आज तक न वह घर लौटी और न ही उसके नए घर का कोई अता-पता चला.

बिहार के सीमांचल कहे जाने वाले पूर्वी ज़िले पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया राज्य के सर्वाधिक पिछड़े ज़िलों में से हैं जहाँ आज भी दो वक्त की रोटी हासिल करना अधिकतर लोगों के लिए चुनौती है.

स्थानीय समाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले एक दशक में इन ज़िलों से ग़ुरबत की शिकार तीन सौ से ज़्यादा लड़कियाँ दलालों के शिकंजों में पहुँचाई जा चुकी हैं. हालाँकि स्थानीय पुलिस इस संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना बताती है.

दलालों का शिकंजा

पूर्णिया में वीरपुर के ईदगाह टोला की आसिया ख़ातून लगभग भग छह साल दलालों के चंगुल में रहने के बाद कुछ वर्ष पहले वापस अपने गाँव आ गई थीं.

आसिया के ग़रीब माँ-बाप ने बिना दहेज की शादी करने और सुखी जीवन के लालच के बहकावे में आकर आसिया को एक दूर के रिश्तेदार के साथ भेज दिया था.

आसिया ख़ातून को छह वर्षों तक दलालों के चंगुल में रहना पड़ा

घर से कंवारी गई आसिया अपनी दो बेटियों के साथ लौटीं. अनपढ़ आसिया कहती हैं, “मुझे बदायूँ और इसके आसपास के इलाक़ों में रखा जाता था. इनमें से एक गाँव का नाम रेलाई है. नाज़िर शाह बाहर के लोगों से ख़ुद को मेरा पति बताता था. पर उसने मुझसे निकाह नहीं किया था. पैसे बनाने में वह मेरा इस्तेमाल करता था और वक्त बे वक्त मेरी बेरहमी से पिटाई भी करता था.”

आसिया बाद में बीमार रहने लगी. वह बताती हैं, “नाज़िर को जब ये लगने लगा कि हमारी सूरत में कोई आकर्षण नहीं बचा है तो उसने हमसे अपना पिंड छुड़ाने की कोशिशें शुरू कर दीं. और एक दिन हमारी दोनों बेटियों के साथ बिहार जाने वाली रेलगाड़ी में हमें बिठा दिया.”

वह कहती हैं. “हम लोग किसी तरह कटिहार पहुँच गए. पर कटिहार से पूर्णिया आना मेरे लिए लोक-लाज का प्रश्न था. महीनों हम अपनी बेटियों के साथ भीख मांग कर गुज़ारते रहे. फिर मैंने सोचा कि हमारी जिंदगी तो कट गई. अब इन दो मासूमों का क्या होगा. अगर मैं अपने गाँव नहीं गई तो हमें सुरक्षा नहीं मिलेगी और हो सकता है इन बेटियों का भी वही हस्र हो. उसके बाद मेरा शरीर ख़ौफ़ से काँपने लगता. फिर मैं हिम्मत कर के अपने गाँव ईदगाह टोला आ गई”.

बुरा हाल

आसिया को पहले तो समाज के लोगों ने बहिष्कार किया पर बाद में एक झोपड़ी में रहने की जगह दे दी.

 नाज़िर को जब ये लगने लगा कि हमारी सूरत में कोई आकर्षण नहीं बचा है तो उसने हमसे अपना पिंड छुड़ाने की कोशिशें शुरू कर दीं. और एक दिन हमारी दोनों बेटियों के साथ बिहार जाने वाली रेलगाड़ी में हमें बिठा दिया.
आसिया ख़ातून

आसिया अब भीख मांगती हैं. लेकिन आठ साल की छोटी बेटी मीनू आरा चंद रोटियों की ख़ातिर दिन भर बीड़ी बनाती है. आसिया ने बड़ी बेटी का निकाह कर दिया है. वह कहती हैं “मेरी ज़िंदगी की यह सबसे बड़ी उपल्बधि है.”

वीरपुर के ईदगाह टोला की 65 वर्षीय मलिका इस इलाक़े की पहली माँ हैं जिनकी बेटी वादेनूर को 1985 में एक दूर का रिश्तेदार शादी कराने के नाम पर पश्चिम बंगाल के मालदा पहुँचा गया, उसके बाद उसका कोई पता नहीं मिला.

मलिका कहती हैं, “हमने सारी जिंदगी ताड़ का रस पी कर बिताई है. अगर पहले पता होता की सुख की रोटी ताड़ के रस से भी कड़वी है तो हम कभी अपनी बेटी को नहीं जाने देते.”

मलिका के पति अब्दुल रज़्ज़ाक़ तो अपनी बेटी के वियोग में जान तक गंवा बैठे. मलिका कहती हैं, “वह अपने ख़ून-पसीने की कमाई का अधिकतर हिस्सा बेटी वादेनूर को तलाशने में खर्च करते थे. और आख़िरकार एक दिन उसकी याद में ही दम तोड़ गये.”

 लड़कियों की इस तस्करी में कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि जो लड़की दलालों की गिरफ्त में है उनपर दबाव बनाया जाता है कि वह अपने इलाक़े से अन्य लड़कियों को भी लाए.
सामाजिक कार्यकर्ता दाऊद आलम

इसी गाँव के पंचायत समिति के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता दाऊद आलम कहते हैं, "लड़कियों की इस तस्करी में कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि जो लड़की दलालों की गिरफ्त में है उनपर दबाव बनाया जाता है कि वह अपने इलाक़े से अन्य लड़कियों को भी लाए."

दाऊद ने कुछ युवाओं के साथ मिलकर एक टास्कफोर्स का गठन किया है जिसका काम इलाक़े में अजनबी चेहरों पर निगरानी रखना है. क्योंकि ये अजानबी लोग ही बक़ौल उनके, यहाँ के मासूम ग़रीबों को अपने जाल में फंसाते हैं.

पूर्णिया के इन क्षेत्रों के माँ-बाप से बिछुड़े बेटियों की सूची यहीँ ख़त्म नहीं होती. महाराजपुर की हौजी किस्कू, पप्पू टुड्डू, घेरघाट से नूरजहाँ, शबनम, इस्लामपुर से नुजरत, रानीबाड़ी से तमीना ख़ातून और उचितपुर से साबरा ख़ातून के अलावा इन गाँवों से जा कर कभी न वापस आने वाली बेटियों के नामों की यह सूची काफ़ी लम्बी है.

पुश फ़ैक्टर?

पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक सुधांशु कुमार इस मामले को लड़कियों की तस्करी नहीं मानते बल्कि इसे लिंग के असंतुलित अनुपात के चलते उत्पन्न ‘पुश फैक्टर’ का सिद्धांत मानते हैं.

 यहाँ के ग़रीब अपनी ख़ुशी से अपनी बेटियों को पश्चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा के लोगों से शादी कर देते हैं. बदले में उलटे उन्हें ही दहेज के बतौर अच्छी रक़म मिल जाती है क्योंकि उन राज्यों में शादी करने के लिए लड़कियों की बड़ी तेज़ी से कमी होती जा रही है.
पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक सुधांशु कुमार

वह कहते हैं, "यहाँ के ग़रीब अपनी ख़ुशी से अपनी बेटियों को पश्चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा के लोगों से शादी कर देते हैं. बदले में उलटे उन्हें ही दहेज के बतौर अच्छी रक़म मिल जाती है क्योंकि उन राज्यों में शादी करने के लिए लड़कियों की बड़ी तेज़ी से कमी होती जा रही है.”

हालाँकि सुधांशु कहते हैं कि इस तरह कि कोई शिकायत पुलिस के पास नहीं आयी है, और शिकायत मिलने पर पुलिस ज़रूर कार्रवाई करेगी. दूसरी तरफ़ समाजिक कार्यकर्ता दाऊद का कहना है कि जिन ग़रीबों के पास खाने के लिए अनाज न हो वह पुलिस के पास शिकायत करने के बदले रिश्वत के बतौर देने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा.

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