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सीमावर्ती लोग सीखेंगे हथियार चलाना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल और भूटान की सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) ने सीमावर्ती गाँवों के युवाओं के लिए हथियार प्रशिक्षण कार्यक्रम फिर शुरू किया है. पहले स्पेशल सर्विस ब्यूरो के नाम से जाने जाने वाले एसएसबी ने सात साल के लंबे अंतराल के बाद यह कार्यक्रम शुरू किया है. वर्ष 1962 में चीन के हाथों मिली हार के बाद भारत सरकार ने 1963 में एसएसबी का गठन किया था. इसकी स्थापना के पीछे मुख्य मक़सद सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों को प्रशिक्षित करना था ताकि चीन या दूसरे किसी देश के भारतीय क्षेत्र में घुसने पर उसका प्राथमिक विरोध हो सके. वर्ष 2001 में एसएसबी को केंद्रीय सचिवालय से हटाकर गृह मंत्रालय के अधीन कर दिया गया. एसएसबी को नेपाल और भूटान सीमा की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दे दी गई. एसएसबी ने सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम फिर शुरू किया है. एसएसबी के प्रशिक्षक इन दिनों पश्चिम बंगाल के उत्तरी शहर सिलीगुड़ी से 15 किलोमीटर दूर रानीडांगा में 15 युवाओं को हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. एसएसबी के सेक्टर कमांडर एचसी पांडेय ने कहा कि प्रशिक्षण 10 दिन तक चलेगा. रानीडांगा के चार सौ युवकों को हथियार प्रशिक्षण देने की योजना है. उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि राष्ट्रीय सीमाओं की प्रभावी सुरक्षा में सीमावर्ती लोग हमारे प्रयासों में भागीदार बनें." हथियार नहीं एसएसबी अधिकारियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों को प्रशिक्षण के बाद हथियार नहीं दिए जाएँगे. लोगों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का मुख्य मक़सद उन्हें सुरक्षा बलों के साथ सहयोग के लिए प्रेरित करना और ज़रूरत पड़ने पर दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार करना है. हालाँकि अभी यह साफ़ नहीं हो सका है कि क्या एसएसबी अपनी तैनाती वाले क्षेत्रों में ही लोगों को इस तरह का प्रशिक्षण देगी. विवाद इसमें शक नहीं कि एसएसबी का ये प्रशिक्षण कार्यक्रम सीमाओं की सुरक्षा में ख़ासा मददगार है, लेकिन असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में ये देखने में आया है कि एसएसबी से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद कुछ युवक चरमपंथी संगठनों से जुड़ गए. पूर्वोत्तर के कई चरमपंथी नेताओं ने माना है कि उन्होंने असम स्थित एसएसबी के प्रशिक्षण केंद्र हफ़लॉंग में पहली बार हथियार चलाने का प्रशिक्षण हासिल किया था. 1978 से 1988 के बीच त्रिपुरा में बंगाली शरणार्थियों के ख़िलाफ़ ख़ूनी संघर्ष में लिप्त ट्राइबल नेशनल वोलंटियर (टीएनवी) के प्रमुख विजय हरंगख़ावल ने कहा, "मैने रायफ़ल से पहली गोली एसएसबी के हाफ़लॉंग शिविर में चलाई." हरंगख़वाल ने 1988 में अपने दूसरे सशस्त्र सहयोगियों के साथ समर्पण कर दिया था और राजनीति में आ गए थे. सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि 'पूर्वोत्तर के अनुभव' से ही एसएसबी को हथियार प्रशिक्षण कार्यक्रम बंद करना पड़ा था. | इससे जुड़ी ख़बरें भूटानी शरणार्थियों के ख़िलाफ कार्रवाई30 मई, 2007 | भारत और पड़ोस भारत से भूटान का सुरक्षा अनुरोध08 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'पूर्वोत्तर की भी भागीदारी होगी'17 जून, 2007 | भारत और पड़ोस उल्फ़ा के संस्थापक की भूटान में मौत19 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस भारतीय विद्रोहियों की पेशकश17 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस तंबाकू-मुक्त देश बनेगा भूटान | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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