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रविवार, 19 अगस्त, 2007 को 14:09 GMT तक के समाचार
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अपहरण की फिरौती भरेंगी बीमा कंपनियाँ

पुलिस
पुलिस अपहरण की वारदातें रोकने में नाकाम रही है
सरकार अभी अपहरण की समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई हो लेकिन बीमा कंपनियाँ इस धंधे में भी मुनाफ़े की संभावनाएँ देख रही हैं.

निजी बीमा कंपनियों को उम्मीद है कि अपहरण के जोख़िम का बीमा बेचकर मुनाफ़ा कमाया जा सकता है.

बीमा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि नोएडा, गाजियाबाद और दूसरे इलाक़ों में अपहरण की वारदातें बढ़ी हैं जिससे लोगों में इस तरह के बीमा के प्रति रुझान बढ़ा है.

लैटिन अमरीका, मध्य-पूर्व और एशिया के कई देश अपहरण के लिए कुख्यात हैं. इन देशों में अपहरण ने एक संगठित अपराध का रूप ले लिया है.

बीमा कंपनियाँ अपने व्यवसाय के लिए इन्ही देशों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं.

बीमा

अपहरण के जोख़िम का बीमा करने वाली निजी कंपनियों में टाटा-एआईजी, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और एचडीएफसी प्रमुख हैं.

 बड़े समूह अपने कर्मचारियों के लिए इस तरह की बीमा पॉलिसी लेती हैं. अगर उनके कर्मचारी का अपहरण हो जाए तो उसे वापस लाने के लिए जो भी खर्चे होंगे उसका भुगतान बीमा कंपनी करेगी. इस दौरान पीड़ित व्यक्ति को कोई चोट लगने, मानसिक रूप से सदमा लगने या पुनर्वास का भुगतान भी बीमा कंपनी करेगी
अनुज त्यागी, प्रबंधक, बीमा कंपनी

आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के प्रबंधक अनुज त्यागी कहते हैं कि इस पॉलिसी में अपहरण से जुड़े कई तरह के ख़र्चों की भरपाई शामिल है.

वे बताते है, “बड़े समूह अपने कर्मचारियों के लिए इस तरह की बीमा पॉलिसी लेती हैं. अगर उनके कर्मचारी का अपहरण हो जाए तो उसे वापस लाने के लिए जो भी खर्चे होंगे उसका भुगतान बीमा कंपनी करेगी. इस दौरान पीड़ित व्यक्ति को कोई चोट लगने, मानसिक रूप से सदमा लगने या पुनर्वास का भुगतान भी बीमा कंपनी करेगी.”

अपहरण की बीमा पॉलिसी को लेकर उद्योग-व्यापार जगत में भी मिला जुला रूझान देखने को मिल रहा है.

कुछ लोगों का मानना है कि इससे अपहृत व्यक्ति को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी वहीं कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इससे अपहरण के उद्योग को बढ़ावा मिलेगा.

अनंत
अभी कुछ समय पहले अनंत नाम के एक बच्चे का अपहरण बहुत चर्चा में आया था

उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल के सचिव चंद्र कुमार छाबड़ा कहते हैं, “मुझे यह बीमा पॉलिसी कहीं से भी सही नहीं लगती. इससे अपहरण की घटनाओं को और प्रोत्साहन मिलेगा.”

लेकिन आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के प्रबंधक अनुज त्यागी का कहना है कि यह बीमा पॉलिसी ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है जो रोज़गार के लिए जोख़िम भरे क्षेत्रों में जाते हैं. वहाँ उन लोगों को इस तरह के संरक्षण की ज़रूरत है.

रिस्क

अनुज त्यागी कहते हैं, “बहुत से लोग इराक़, अफ़गानिस्तान जैसे देशों में रोज़गार की तलाश में जाते हैं. इन देशों में अपहरण की घटनाएँ होती रहती हैं. इन कर्मचारियों को काम देने वाली कंपनियाँ यह बीमा पॉलिसी ख़रीदती हैं.”

 मुझे यह बीमा पॉलिसी कहीं से भी सही नहीं लगती. इससे अपहरण की घटनाओं को और प्रोत्साहन मिलेगा
चंद्र कुमार छाबड़ा, व्यापारी नेता

कई लोगों का मानना है कि जिस तरह अपहरण करके फिरौती की माँग करना एक अपराध है उसी तरह फिरौती के लिए बीमे का करार ग़ैर-कानूनी है.

लेकिन अवकाश प्राप्त पुलिस महानिदेशक ईश्वरचंद्र द्विवेदी इसे ग़ैर-क़ानूनी नहीं मानते.

वे कहते हैं, “मैं इसे दूसरी तरह से देखता हूँ. बीमा कंपनियों का काम है जोख़िम पर भुगतान करना. लोग तभी बीमा कराएँगे जब उनको जोख़िम होगा और उन्हें लगेगा कि उन्हें इसकी ज़रूरत है.”

नागरिकों के जान-माल की रक्षा करना राज्य का मूलभूत दायित्व है. अगर सरकारें यदि अपनी इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पाएँ तो क्या बीमा कंपनियाँ राज्य का विकल्प बन सकती हैं?

इस बारे में व्यापारी नेता चंद्र कुमार छाबड़ा का कहना है कि अपहरण का मामला बहुत संवेदनशील और तुरंत फ़ैसला लेने वाला होता है ऐसे में बीमा कंपनी कैसे मदद कर पाएगी इस पर अनेक सवाल खड़े होते हैं.

चंद्र कुमार कहते हैं, “बीमा कंपनियों के ज़रिए इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. जब फ़िरौती माँगी जाती है तो इसके भुगतान की एक समय सीमा भी होती है. यह समय सीमा बहुत ज़्यादा नहीं होती है. ऐसे हालात में ये बीमा कंपनियाँ भला कैसे भुगतान करेंगी.”

अपहरण बीमा की इस पॉलिसी से अभी तक कितने लोगों को फ़ायदा हुआ है इस पर रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है.

मीडिया में ख़बरें आने के बाद लोगों में अपहरण बीमा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है. लेकिन लोग यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि यह पॉलिसी व्यावहारिक रूप से मदद कर पाएगी या नहीं क्योंकि बीमा कंपनियाँ इसे बेहद गोपनीय तरीके से चला रही हैं.

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