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वाजपेयी का राजनीतिक सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी को सांसद के रूप में लगभग चार दशक का अनुभव प्राप्त है. मध्यप्रदेश में ग्वालियर में 25 दिसंबर, 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति शास्त्र में एमए किया और फिर कुछ राजनीतिक पत्रिकाओं का संपादन किया. इनमें राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन शामिल हैं. वर्ष 1942 में स्वाधीनता के आंदोलन के दौरान वे कुछ समय के लिए जेल में रहे. वे सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में काफ़ी सक्रिय रहे हैं और हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े रहे हैं. वर्ष 1951 में वे जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने. वे पहली बार संसद सदस्य वर्ष 1957 में बने और अपने राजनीतिक सफ़र में उन्होंने कई बार माना कि वे पंडित नेहरू से काफ़ी प्रभावित हुए. पंडित नेहरू ने उनके बारे में कहा था कि वे एक प्रतिभावाशाली सांसद हैं जिनके राजनीतिक सफ़र पर नज़र रखनी चाहिए. संसद सदस्य के रूप में लगभग चार दशक के सफ़र में वे पाँचवीं, छठी, सातवीं और फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभी के सदस्य रहे हैं. प्रभावशाली वक्ता, विदेश मंत्री इस दौरान वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण ख़ासे ग़ौर से सुने जाते रहे हैं. जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इंदिरा गांधी सरकार के ख़िलाफ़ जनांदोलन छेड़ा गया तब आपातकाल के दौरान वर्ष 1975 से 1977 के बीच उन्हें जेल जाना पड़ा.
आपातकाल के बाद वे जनता पार्टी के संस्थापक-सदस्यों में से एक बने और मोरारजी देसाई सरकार में लगभग दो साल से ज़्यादा समय के लिए देश के विदेश मंत्री बने. जब जनता पार्टी का विभाजन हुआ तो जनसंघ के सदस्यों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया और छह साल तक वाजपेयी भाजपा के अध्यक्ष रहे. जब भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 1996 में पहली बार सरकार बनाई तो वाजपेयी ने सरकार का नेतृत्व किया और प्रधानमंत्री बने. लेकिन संसद में बहुमत न हासिल कर पाने के कारण ये सरकार केवल 13 दिन ही चल पाई. परमाणु बम धमाका, लाहौर यात्रा वर्ष 1998 में दूसरी बार भाजपा ने अन्य दलों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई और वाजपेयी दोबारा भारत के प्रधामंत्री बने. ये सरकार केवल डेढ़ साल चली और इस दौरान पोखरण में मई 1998 में भारत ने दूसरी बार परमाणु बम धमाके किए. इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी आलोचना हुई और भारत पर कुछ प्रतिबंध भी लगे लेकिन वाजपेयी ने इन्हें भारत की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी बताया.
इसके बाद फ़रवरी 1999 में वाजपेयी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की और बस यात्रा करते हुए अमृतसर से लाहौर पहुँचे. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी ख़ासी प्रशंसा हुई. लेकिन जब करगिल में पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ हुई तब कड़ा रुख़ अपनाते हुए उन्होंने सैन्य कार्रवाई का आदेश दिया और कई दिन तक चली कार्रवाई में भारतीय सेना घुसपैठियों को खदेड़ दिया. पाकिस्तान, चीन पर पहल इसके बाद मध्यावधि चुनाव हुए और 1999 में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने. ये सरकार पूरी पाँच साल चली और ऐसा पहली बार हुआ कि किसी ग़ैर-कांग्रेसी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया हो. वर्ष 2001 में दूसरी बार पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के मकसद से उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को आगरा शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया लेकिन इसका नतीज़ा ज़्यादा सकारात्मक नहीं निकल पाया. इसके बाद तीसरी बार मई 2003 में वाजपेयी ने फ़िर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश रखी और उसके बाद से भारत-पाकिस्तान रिश्ते काफ़ी बेहतर हुए हैं. वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए चीन से भी संबंध बेहतर बनाने की कोशिश हुई और वे चीन यात्रा पर गए. लेकिन उनके इसी कार्यकाल के दौरान गुजरात में मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगे हुए जिसमें अनेक लोग मारे गए और इस पर वाजपेयी की कड़ी आलोचना भी हुई. अनेक पर्यवेक्षक मानते हैं कि गुजरात जाकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह देने के अलावा, केंद्र सरकार ने उस समय कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई. (बीबीसी हिंदी डॉटकाम ने इस साल अगस्त में एक ऑनलाइन सर्वेक्षण कराया. पाठकों से आज़ाद भारत के साठ साल की सबसे महान हस्ती को वोट देने को कहा गया. महात्मा गांधी का नाम इस सर्वेक्षण में शामिल नहीं किया गया. पाठकों ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 'महानतम' हस्ती के रूप में सबसे अधिक मत दिए.) |
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