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सोमवार, 06 अगस्त, 2007 को 14:50 GMT तक के समाचार
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'क़िस्मत में यही लिखा है...'

मंजू देवी
प्रसव के दौरान देखभाल न होने से बच्चे को खोना पड़ा मंजू देवी को
उत्तर बिहार की बाढ़ ने लाखों लोगों को मुसीबत का शिकार बना दिया है लेकिन रामलोचन शाह के परिवार की मुसीबतें कुछ अलग तरह की ही हैं.

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के वीरसिंहपुर गाँव के इस परिवार को बाढ़ के प्रकोप ने कहीं का नहीं छोड़ा है. वीरसिंहपुर एक ऐसा गाँव है जो दो तरफ़ से बागमती और एक तरफ़ से बूढ़ीगंडक नदी से घिरा है. बिहार की ये दोनों नदियाँ बाढ़ के प्रकोप के लिए जानी जाती हैं.

बाढ़ की तबाही के बीच समुचित इलाज और देख-भाल के अभाव में रामलोचन शाह का पोता पैदा होते ही दम तोड़ चुका है और अब पुत्रवधू मौत से जूझ रही है.

अचानक यह ख़बर फैली कि बागमती नदी का पानी हाहाकार मचाते हुए गाँव में प्रवेश कर रहा है. लोग आतंकित थे और जान की सलामती के लिए गाँव छोड़ कर बूढ़ीगंडक नदी के बाँध की ओर भाग रहे थे. इसी वक़्त उनकी 23 वर्षीय पुत्रवधू मंजू देवी प्रसव पीड़ा से जूझ रही थीं.

बाढ़
बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया

पड़ोसियों को भी सिर्फ़ अपनी चिंता थी. कोई उनके घर की तरफ़ मुड़ के भी नहीं देख रहा था. मुसीबतों का पहाड़ तो तब और बड़ा हो गया जब गाँव की दाई जो आम तौर पर प्रसव के दौरान जच्चे और बच्चे की देखभाल करती है, वह भी मंजू को छोड़कर भाग खड़ी हुई.

ईंटों के सहारे ऊँची की चौकी

रामलोचन शाह कहते हैं, “मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया था. एक तरफ़ बाढ़ के पानी का क़हर तो दूसरी तरफ़ मंजू की समस्या. हम उसे कहीं ले जाने की स्थिति में भी नहीं थे क्योंकि मंजू को उस हालत में कहीं खुले आकाश में ले जाना भी मुनासिब नहीं था इसलिए वह जिस चौकी पर थी उसे ही हम ईंट के सहारे और ऊँचा करते जा रहे थे.”

देखते-देखते बाढ़ बेक़ाबू होती जा रही थी. दूसरी तरफ़ मंजू की असह्य पीड़ा ख़तरनाक होती जा रही थी.

मंजू के 26 वर्षीय पति रामनाथ शाह कहते हैं, “पास के गाँव से कुछ दूरी पर एक सरकारी अस्पताल है. मैं वहाँ गया. वहा भी कोई डाक्टर नहीं था. हमें बाढ़ के मुतल्लिक़ जो ख़बरें मिल रही थीं उसमें समस्तीपुर शहर की तरफ़ भी मंजू को ले जाना संभव नहीं था. ट्रेन सेवाएं पहले से ही बंद थीं. इलाज न मिलने की वजह से जब बच्चा पैदा होने के आधे घंटे के भीतर ही दुनिया से चल बसा.”

 हमें बाढ़ के मुतल्लिक़ जो ख़बरें मिल रही थीं उसमें समस्तीपुर शहर की तरफ़ भी मंजू को ले जाना संभव नहीं था. ट्रेन सेवाएं पहले से ही बंद थीं. इलाज न मिलने की वजह से जब बच्चा पैदा होने के आधे घंटे के भीतर ही दुनिया से चल बसा
रामनाथ शाह

अब दोपहर से शाम होती जा रही है. रामलोचन शाह अपने पोते का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. उन्होंने बाँध की ऊँचाई की तरफ़ ले जाकर पोते को दफन कर दिया है.

अंत कब होगा...

बीती रात से अब तक बड़े तो बड़े किसी बच्चे के पेट में भी एक निवाला नहीं गया है. इधर परिवार की मुसीबतों का अंत होता नहीं दिख रहा.

पोता तो दुनिया से गया ही और अब पुत्रवधू की हालत भी नाज़ुक है. जहाँ तक आँखें जाती हैं, पानी ही पानी है. बहू के इलाज का भी कोई उपाय नहीं हो सका है. रामलोचन शाह असहाय हैं और दोनो हाथ जोड़कर ईश्वर से मदद की प्रार्थना कर रहे हैं.

रामलोचन परिवार
रामलोचन के परिवार जैसे अनेक परिवार द्रवित हैं

पास में मंजू असहाय लेटी कराह रही है. न कोई दवा है और न ही कोई मददगार. पति रामनाथ के हाथ में एक पुर्जा है जिसपर चंद दवाओं के नाम दर्ज हैं. इन दवाओं को एक ऐसे आदमी ने लिखा है जो डाक्टर तो नहीं है लेकिन रामनाथ के मुताबिक़ दवाओं की कुछ समझ रखता है.

दवाओं की इस लिस्ट में सिर्फ़ विटमिन की गोलियाँ और एक टॉनिक का नाम शामिल है. उनके पास दवा ख़रीद कर ले आने का कोई ज़रिया नहीं है. ये दवाएं कैसे और कहाँ से लाई जाएँ, यह बात समझ में नहीं आ रही है.

गाँव से कुछ दूर जो दुकान है वहाँ ये दवाएं हैं नहीं और बाढ़ ने शहर जाने के विकल्प को भी छीन लिया है.

इधर मंजू इस हालत में नहीं हैं कि कुछ बात कर सकें. वह कभी अपने नवजात की असमय मौत के सदमे से तो कभी रक्तस्राव से कमजोर होते शरीर के दर्द से निढाल हो रही है. इस कुनबे को न तो अब सरकार से और ना ही समाज से कुछ उम्मीदें हैं.

रामलोचन शाह कहते हैं, "क़िस्मत में यही लिखा है तो सरकार या समाज से क्या उम्मीद करें. जो होना होगा वही होगा.”

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