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शुक्रवार, 20 जुलाई, 2007 को 02:45 GMT तक के समाचार
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नेपाल में 'देवी' की हुई बहाली
सजनी शाक्य
'देवी' की वापसी का स्वागत किया गया
नेपाल में पदवी छीनकर बर्खास्त कर दी गई 'देवी' को बहाल कर दिया गया है.

दस वर्ष की 'देवी' पर आरोप था कि उसने परंपरा तोड़कर अमरीका की यात्रा की.

मंदिर के अधिकारियों का कहना है कि 'देवी' की पदवी लौटाने का फ़ैसला इसलिए किया गया क्योंकि उसने जल्दी ही 'शुद्धिकरण' के लिए हामी भरी है.

'देवी' का नाम सजनी शाक्य है और उनकी उम्र है दस वर्ष.

वह नेपाल की सबसे पूज्यनीय तीन कुमारियों में से एक हैं. कुमारियों को हिंदू और बौद्ध दोनों एक जैसा सम्मान देते हैं.

कई तरह की परीक्षाओं पर खरा उतरने के बाद दो वर्ष की उम्र में सजनी शाक्य को 'कुमारी' चुना गया था और उनसे उम्मीद थी कि रजस्वला होने से पहले (यानी मासिकधर्म शुरु होने से पहले) तक वह उत्सवों में हिस्सा लेगी और भक्तों को आर्शीर्वाद देती रहेंगीं.

लेकिन उनकी अमरीका यात्रा ने मंदिर के वरिष्ठ लोगों को नाराज़ कर दिया था.

संवाददाताओं का कहना है कि जब सजनी शाक्य अमरीका से वापस लौटीं तो वह इस विवाद से वाकिफ़ नहीं थीं.

सजनी काठमांडू के पड़ोस भक्तपुर की 'कुमारी' हैं और हाल ही में एक डॉक्यूमेंट्री के प्रचार के लिए अमरीका गई थीं.

वह अमरीका में 39 दिनों तक रहीं और वाशिंगटन में उन नेपालियों से मिलीं जो अमरीका में रह रहे हैं.

इस डॉक्युमेंट्री को बनाने वाली ब्रितानी निदेशक इशबेल व्हाइटाकर ने इस विवाद के लिए माफ़ी माँगी है.

मंदिर के बुज़ुर्गों ने इससे पहले कहा था कि अमरीका की यात्रा करने से सजनी की पवित्रता नष्ट हो गई और अब वे उसकी उत्तराधिकारी की तलाश करेंगे.

लेकिन अब वे कह रहे हैं कि 'शुद्धिकरण संस्कार' से 'देवी' के वो सब पाप धुल जाएँगे, जो उसने किए होंगे.

32 गुणों वाली

उल्लेखनीय है कि एक ख़ास बौद्ध संप्रदाय से कुमारियों का चयन किया जाता है, जब उनकी उम्र दो से चार वर्ष के बीच होती है.

सजनी शाक्य
कुमारी चुनने के लिए 32 गुण अनिवार्य माने जाते हैं

परंपराओं के अनुसार किसी भी 'कुमारी' में 32 गुणों का होना अनिवार्य माना जाता है, जिसमें हिरणों की तरह की जांघ और शंख की तरह की गर्दन शामिल है.

'कुमारी' को अपने महल के भीतर ही रहना होता है और उसे साल में तीन या चार बार ही बाहर आने का मौक़ा मिलता है.

वह रजस्वला होने तक कुमारी रह सकती है और इससे पहले दूसरी कुमारी यानी उत्तराधिकारी ढूँढ़ लेना ज़रुरी होता है.

कुमारी के बाहर जाने का सबसे बड़ा अवसर तब होता है जब वर्षा शुरु होती है.

परंपरा है कि कुमारी के पैर ज़मीन पर नहीं लगने चाहिए और इसलिए उसके लिए हमेशा कालीन बिछाई जाती है.

उल्लेखनीय है कि इस कुमारी प्रथा का विरोध भी होता रहा है और पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के आदेश दिए थे कि कहीं कुमारी प्रथा के पीछे लड़कियों का शोषण तो नहीं होता.

कुमारीदेवी पूजा की जाँच
नेपाल में सुप्रीम कोर्ट ने देवी पूजा की प्रथा की जाँच का आदेश दिया है.
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