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गुरुवार, 05 जुलाई, 2007 को 16:36 GMT तक के समाचार
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'जहाँ पहली साँस ली, वहीं आख़िरी साँस भी'

मंज़ूर ने अपना गाँव छोड़कर जाने से इनकार कर दिया था
पाकिस्तानी नागरिक शेख़ मंज़ूर 81 वर्ष की आयु में जब बिहार के समस्तीपुर ज़िले के अपने पैतृक गाँव भेरोखरा पहुँचे तो उन्होंने यहीं की मिट्टी में दफ़न होने की ठान ली.

वीज़ा अवधि से ज्यादा ठहरने की वजह से भारत सरकार ने पहले तो उन्हें गिरफ्तार कर पाकिस्तान भेजने का आदेश दिया.

लेकिन बाद में अर्ज़ी को मंज़ूर करते हुए उनकी वीज़ा की अवधि बढ़ा दी और अपने गाँव में दफ़न होने की मंज़ूर शेख़ की अंतिम इच्छा बुधवार को पूरी हो गई.

एक हफ़्ता पहले ही गृह मंत्रालय ने उनकी वीज़ा की अवधि बढ़ा दी थी जो उनके लिए मौत का वीज़ा साबित हुआ और वह सदा के लिए इसी मिट्टी में सो गए.

पेशे से किसान उनके 60 वर्षीय बेटे अमीन अहमद अपने अब्बा की कहानी इस तरह बयान करते हैं--

आख़िरकार अब्बा को मादरे वतन की मिट्टी नसीब हो गई और हमें उनका ख़ोया प्यार. उनकी आख़िरी ख़्वाहिश थी कि वे अपने गाँव भेरोखरा में ही आख़िरी साँस लें जहाँ उन्होंने पहली साँस ली थी.

मेरे अब्बा 37 वर्षों बाद जब यहाँ आये तो उन्होंने अपनी यही ख़्वाहिश हम दोनों भाइयों के सामने रखी थी. लेकिन समस्या यह थी कि भारत में ठहरने के उनके वीज़े की मियाद अप्रैल में ही ख़त्म हो चुकी थी और भारतीय गृह मंत्रालय ने पिछले 11 मई को एक आदेश जारी कर कहा था कि उन्हें तीन दिनों के अंदर गिरफ़्तार कर पाकिस्तान भेज दिया जाए.

हम इसके लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन और गृह मंत्रालय के एहसानमंद हैं कि अब्बा की बीमारी और उनकी नाज़ुक हालत को देखते हुए उन्हें यहाँ रहने की अनुमति दे दी गई और उनकी आख़िरी ख़्वाहिश पूरी हो गई.

अब्बा की क़िस्मत उनके साथ हमेशा विचित्र खेल खेलती रही. वह पोस्ट एंड टेलीग्राफ़ महकमे में काम करते थे. आज़ादी के कुछ ही वर्ष पहले उनका तबादला सिलहट हो गया. सिलहट पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना लेकिन जब पाकिस्तान 1971 में विभाजित हुआ तो इसके कुछ महीने पहले ही उनका तबादला कराची हो गया.

ऐसे में हम दोनों भाई और हमारी माँ यहीं रह गये. जब वह पाकिस्तानी शहर कराची चले गए तो उसके बाद हमें उनकी कोई भी ख़बर मिलनी बंद हो गई. फिर कई उड़ती ख़बरें आईं कि उनकी मौत हो गई.

मंज़ूर ने अपना गाँव छोड़कर जाने से मना कर दिया था

जब हमें यह यक़ीन हो गया कि हमारे अब्बा इस दुनिया में नहीं रहे तो हमने उनके जनाज़े की नमाज़ 1978 में ही अदा कर दी. हालाँकि माँ कहा करती थीं कि वह मरे महीं है. लेकिन रिश्तेदारों ने समझाया कि ग़फ़लत में रहने से क्या होगा.

फिर शायद यह 1980 की बात है, जब हमें एक ख़त मिला. यह कराची से लिखा हुआ था. मज़मून पढ़कर हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. अब्बा ने लिखा था, 'हम सलामत हैं लेकिन बहुत बीमार हैं और अपने बच्चों को देखने के लिए बेताब हैं. हम आना चाहते हैं हमें बुला लो.’

उस दिन ख़त पढ़कर हम दोनों भाई और अम्माँ फूट-फूट कर रोए. ये ख़ुशी के आँसू थे. तब ही हमने तय तय कर लिया था कि अब्बा को ज़रूर बुलाएँगे. वर्षों तक हम कोशिश करते रहे. वीज़ा मिलना आसान नहीं था. जब दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते अच्छे होने लगे तो हमारी क़िस्मत भी चमक गई.

हम पिछले साल फ़रवरी में पाकिस्तान गए. वहाँ हमने अपने अब्बा की हालत देखी तो नहीं रहा गया. पिछले साल जुलाई में हम उन्हें अपने घर ले आए. हम ख़ुशकिस्मत रहे कि मेरी माँ की मौत अब्बा की आँखों के सामने, बल्कि उनकी बाहों में हुई. यह पिछले मई महीने की बात है.

अब्बा किसी भी क़ीमत पर यहाँ से वापस नहीं जाना चाहते थे. लेकिन उनके वीज़े की अवधि ख़त्म हो रही थी. एक बार हमने पहले ही वीज़ा की मियाद बढ़वा ली थी. इसके बाद हमें मई के दूसरे हफ़्ते में सरकार के यहाँ से एक ख़त मिला जिसमें लिखा था कि मेरे पिता को तीन दिन के भीतर गिरफ़्तार कर पाकिस्तान पहुँचा दिया जाए.

लेकिन मैं यह मानता हूँ कि अब्बा को, अपने वतन और हमारी मुहब्बत की ताक़त ने इसी सरज़मीन पर दफन होने का अवसर दे दिया. आज वह इसी मिट्टी में सदा के लिए सो गए हैं. हमें इस बात का फ़ख्र है. हमें अपने वतन पर यहाँ की सरकार पर फ़ख्र है.

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