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असम के हिंदी भाषियों की पीड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम में रहने वाले हिंदी भाषी राज्य में मई के तीसरे हफ़्ते में हुए बम धमाकों और हत्या की वारदातों के बाद एक बार फिर राज्य से बाहर जाने लगे हैं. प्रवासियों पर हुए इन हमलों में क़रीब नौ लोग मारे गए थे और 20 से अधिक लोग घायल हो गए थे. मई के तीसरे हफ़्ते में हुए इन बम धमाकों के लिए यूनाइटेड लिब्रेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (अल्फ़ा) के अलगाववादियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. असम राज्य के तिनसुखिया और शिबसागर ज़िलों में रहने वालों हिंदी भाषी प्रवासियों पर तीन महीने की शांति के बाद बम हमले हुए. इसके बाद असम के सुदूर उत्तरी ज़िले तिनसुखिया से लेकर पश्चिमी ज़िले बोंगाईगांव में लगातार बम हमले हुए. असम की राजधानी गुवाहाटी के फ़ैंसीबाज़ार बम हमले में घायल हुए राम खिलावन कहते हैं,"मैं अपने परिवार के साथ वापस बिहार जा रहा हूँ. रोज़ीरोटी से ज़्यादा ज़रूरी ज़िंदगी है." गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के लिए इंतज़ार कर रहे राम खिलावन ने बताया,"अगर मुझे बिहार में काम नहीं मिला तो मैं शायद दिल्ली या पंजाब चला जाउंगा." उत्तर-पूर्व में हिंदी भाषी लोगों के संगठन पूर्वोत्तर हिंदुस्तानी सम्मेलन का कहना है कि मई में हुए हमलों के बाद हिंदी भाषी लोग तेज़ी से असम छोड़ने लगे हैं. पूर्वोत्तर हिंदुस्तानी सम्मेलन के सचिव एसपी राय ने कहा,"जनवरी में शुरू हुए हमलों के बाद कम से कम एक लाख हिंदी भाषी प्रवासी असम छोड़ चुके हैं. लोगों का जाना कम हो रहा था लेकिन हाल में हुए हमलों के बाद इसमें तेज़ी आ गई." सुरक्षा बल
असम सरकार ने माना कि जनवरी में अल्फ़ा के हमले शुरू होने की वजह से हज़ारों हिंदी भाषी लोग राज्य छोड़कर जा चुके हैं. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने इन हमलों के लिए सुरक्षा बलों की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया. उनका कहना है कि जिन जगहों पर हिंदी भाषी लोग अधिक संख्या में रह रहे हैं वहां 40,000 और ज़्यादा सुरक्षा बलों की ज़रूरत है. मुख्यमंत्री ने कहा कि इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हमें दूसरी जगहों से सुरक्षा बल लेने पड़ेंगे जहां अल्फ़ा के ख़िलाफ़ बड़े और सक्रिय अभियान चलाए जा रहे हैं. तरुण गोगोई ने बताया,"यही अल्फ़ा चाहता है. इसीलिए वो इन ठिकानों पर हमला कर रहा है." असम के पुलिस प्रमुख आरएन माथुर ने कहा कि हाल के हफ़्तों में अल्फ़ा के ख़िलाफ़ चलाए गए अभियानों में 50 से अधिक विद्रोही मारे या पकड़े गए हैं जिनमें अल्फ़ा की सैन्य विंग के बड़े नेता शामिल हैं. माथुर का कहना है,"इसी वजह से अल्फ़ा के लोगों ने फिर से हिंदीभाषी लोगों पर हमले करने शुरू कर दिए हैं." असर ऊपरी असम के तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिबसागर और गोलाघाट ज़िलों से सबसे अधिक लोग राज्य से बाहर गए हैं. इसी क्षेत्र में अल्फ़ा के विद्रोहियों ने 80 हिंदी भाषी लोगों को मार डाला था. हाल में हुए हमलों में भी यहीं के लोग मारे गए थे. ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य का कहना है,"अगर हिंदी भाषी प्रवासी राज्य छोड़कर जाते हैं तो उनकी जगह बांग्लादेश के ग़ैरक़ानूनी प्रवासी आ जाएंगे. हम ऐसा नहीं होने दे सकते." आसू ने 1980 के दशक में ग़ैरक़ानूनी आव्राजन के ख़िलाफ़ अभियान चलाया था. | इससे जुड़ी ख़बरें कांग्रेस के एक और नेता की हत्या24 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम में बम हमला, तीन घायल28 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम में अल्फ़ा का राज्यव्यापी बंद आज03 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस असम धमाका: एक की मौत, 12 घायल08 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस असम में बम विस्फोट, 15 घायल04 मई, 2007 | भारत और पड़ोस असम में तीन और हिंदीभाषियों की हत्या16 मई, 2007 | भारत और पड़ोस असम में विस्फोट, 13 लोग घायल21 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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