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बुधवार, 28 मार्च, 2007 को 09:52 GMT तक के समाचार
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ख़ुद देख नहीं सकते पर सहारा बनने की कोशिश

छोटा विमान
माइल्स इस सफ़र से दस लाख पाउंड जुटाना चाहते हैं
एक छोटे हवाई जहाज़ में लगभग आधी दुनिया का सफ़र कई लोगों के लिए डरा देने वाला विचार हो सकता है, मगर दृष्टिहीन माइल्स हिल्टन बार्बर के लिए नहीं.

ब्रितानी नागरिक माइल्स हिल्टन दो सीटों वाला अपना 'माइक्रो प्लेन' उड़ाते हुए लंदन से सिडनी के सफ़र पर निकल पड़े हैं और इसी क्रम में मंगलवार को भोपाल पहुँचे.

जोखिम से भरे उनके इस सफ़र का मकसद है दूसरे दृष्टिहीनों की ज़िदगी में उजाले की चमक भरना.

इस महीने के पहले सप्ताह में लंदन से अपना सफ़र शुरू करने वाले 58 वर्षीय माइल्स ने कहा कि जहाज़ उड़ाने वाले वह विश्व के पहले अंधे व्यक्ति हैं.

माइल्स ने यह क़दम दृष्टिहीन लोगों के इलाज के लिए दस लाख पाउंड की राशि जमा करने के इरादे से उठाया है. वे इस राशि को व्यक्तिगत अनुदान और संस्थाओं के अनुदान से एकत्र करने की कोशिश कर रहे हैं.

उनका यह नेक काम स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के 'देखना ही विश्वास करना है' अभियान का हिस्सा है.

इस अभियान के तहत वर्ष 2010 तक एक करोड़ दृष्टिहीन लोगों की आँखों की रोशनी वापस लाने के लिए उनका इलाज करवाया जाएगा.

माइल्स ने कहा,"इस पैसे को विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की देख-रेख में ख़र्च किया जाएगा."

पायलट बनना चाहते थे

माइल्स चंद दनों में भोपाल से रायपुर और फिर कोलकाता होते हुए बांग्लादेश, बर्मा, मलेशिया, थाइलैंड और फिर ऑस्ट्रेलिया जाएंगे.

उनके साथ इस सफ़र में रिचर्ड मेरेडिथ हार्डी भी मौजूद हैं, जो एक पायलट हैं.

 एकत्र हुए पैसे को विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की देख-रेख में ख़र्च किया जाएगा
माइल्स

अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के अनुसार ऐसी जोखिम भरे उड़ान में दृष्टिहीन व्यक्ति के साथ एक ऐसे आदमी का होना ज़रूरी है जो आपातकाल में जहाज़ की कमान संभाल सके.

माइल्स का विशेष जहाज़ 'स्पीच आउटपुट टेक्नॉलजी' नामक कंप्यूटर सॉफ्टवेयर से लैस है.

इससे जहाज़ उड़ाने के लिए ज़रूरी सूचनाएं उन्हें समय-समय पर मिलती रहती है.

माइल्स का कहना है कि हमारे जीवन में दायरा उतना ही होता है जितना हम ख़ुद तय करते हैं, क्योंकि किसी व्यक्ति की किस्मत उसके हालात पर नहीं बल्कि उसकी सोच पर निर्भर करती है.

माइल्स ख़ुद दृष्टिहीन हैं इसलिए उन्हें दूसरे दृष्टिहीनों की मदद करते हुए काफ़ी ख़ुशी हो रही है.

18 वर्ष की उम्र में उन्होंने लड़ाकू विमान का पायलट बनने की कोशिश भी की थी लेकिन आँखों में रोशनी न होने की वजह से उन्हें चयन प्रक्रिया से छाँट दिया गया था.

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