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सोमवार, 19 फ़रवरी, 2007 को 14:20 GMT तक के समाचार
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परिजनों की तलाश में भटकते लोग

तौफ़ीक़
तौफ़ीक़ ने बताया कि सुबह से मौसा-मौसी और उनके बेटा की पहचान करने के लिए भटक रहे हैं
समझौता एक्सप्रेस के दो डिब्बों में हुए विस्फोट ने कई लोगों की जानें ले ली और अब उनके रिश्तेदार अपने परिजनों की पहचान करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं.

दिनेश गुलेरिया ऐसे ही लोगों में से हैं जो उत्तर प्रदेश से भागे-भागे पानीपत पहुंचे लेकिन सुबह से अपने रिश्तेदारों का कुछ पता नहीं लगा पाए.

वो कहते हैं, "मेरे फूफा, बुआ और उनका आठ साल का बच्चा था. वो सामान्य डिब्बे में थे. कुछ पता नहीं चल रहा है. मैं फ़ोन पर फ़ोन किए जा रहा हूँ. अस्पताल भी गया. कुछ पता नहीं चला."

गुलेरिया की तरह ही अफ़सर अली भी अपने रिश्तेदारों को खोजने आए हैं.

उन्होंने जले हुए डिब्बों के पास पुलिसवालों से और पत्रकारों से अपने रिश्तेदारों का हाल पूछते घूम रहे थे.

दिनेश
दिनेश भी अपने रिश्तेदारों के बारे में जानकारी पाने के लिए व्याकुल थे

राजस्थान के झूंझनू ज़िले से आए तौफ़ीक मोहम्मद के मौसी-मौसा और उनका बेटे का भी कुछ पता नहीं चला है.

पानीपत के सिविल अस्पताल में पुलिसवालों के आगे-पीछे घूमते हुए तौफीक़ ने कहा, "हमें तो बीबीसी रेडियो से सुबह पता चला कि हादसा हुआ है. मेरे मौसा अब्दुल अज़ीज, उनकी पत्नी और बेटा मजीद ट्रेन में थे. अब लाशें भी पहचान में नहीं आ रही हैं."

जहाँ तौफ़ीक़ को उम्मीद थी कि उनके रिश्तेदार ज़िदा होंगे वहीं कश्मीर के सज्जन मोहम्मद मक़बूल कुरैशी की पत्नी की इसी हादसे में मौत हो गई है.

नम आंखों से कुरैशी बोले, "अब क्या करें. कुछ गाड़ी की व्यवस्था कर रहे हैं. ले जाएँगे कैसे भी."

 हमें तो बीबीसी रेडियो से सुबह पता चला कि हादसा हुआ है. मेरे मौसा अब्दुल अज़ीज, उनकी पत्नी और बेटा मज़ीद ट्रेन में थे. अब लाशें भी पहचान में नहीं आ रही हैं
तौफ़ीक़

दिल्ली के अब्दुल्ला अज़ीज़ शिकायत करते हैं कि अभी तक उन लोगों की सूची नहीं मिली है जो अटारी पहुंचे हैं. शायद इस उम्मीद से कि उनके रिश्तेदार जीवित बच गए हों.

शाम तक पानीपत के सिविल अस्पताल में साठ से अधिक लाशें नज़र आर् रही थीं और देर शाम तक सिर्फ़ सात से आठ लाशों की पहचान हो पाई थी.

फ़र्रुखाबाद से आए वक़ार का छह लोगों का परिवार इस ट्रेन में था. उन्होंने रोते हुए वो कलम दिखाई जो उन्होंने अपने फूफा को दी थी.

उनके फूफा इस हादसे में मारे गए और वक़ार बस इतना चाहते हैं कि बाक़ी लोगों के बारे में कुछ पता चले.

अब्दुल्ला अज़ीज
अब्दुल्ला को उम्मीद है कि शायद उनके परिजन अटारी पहुँच गए हों

उनका कहना है कि यही पता चल जाए कि रिश्तेदार जीवित बचे हैं या नहीं. ये छह लोगों का परिवार कराची जा रहा था.

कार्रवाई किसी की, ख़ामियाज़ा किसी को भुगतना पड़ा, लाशों की पहचान मुश्किल, ज़िम्मेदार कौन? ये सारे सवाल इन लोगों की आंखों में हैं, लेकिन अस्पताल में काम करने वाले रोहतास बस इतना कह कर सबको चुप करवा देते हैं कि लाशें इतनी बुरी तरह जली हैं कि कोई कैसे पहचानेगा.

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