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बुधवार, 06 दिसंबर, 2006 को 16:50 GMT तक के समाचार
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छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी....

दिल्ली-लाहौर के बीच जुड़े तार
बच्चों ने बँटवारे से लेकर शाहरुख़ ख़ान तक के बारे में एक दूसरे से बातचीत की
सरहद पार से एक बच्चे की आवाज़ सुनाई दी, उसने कहा...'क्यों न हम सभी पिछले सारी बातों के किनारे रखकर फिर से नए संबंधों की बुनियाद रखें क्योंकि इन दोनों ही मुल्कों का हम ही भविष्य हैं...' और याद आया एक तराना-

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी,
नए दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी.

यह मौक़ा था दिल्ली और लाहौर के कुछ स्कूली बच्चों के बीच वेबकास्टिंग के ज़रिए बातचीत का जिसमें ग़रम होती बहस को लाहौर के एक बच्चे ने ऊपर बताए वाक्य से संभाला और दोनों ओर की अगली पीढ़ी को एक रास्ता सुझाया.

दरअसल, इन दिनों बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की ओर से दो दिसंबर से नौ दिसंबर के बीच एक विशेष सप्ताह का आयोजन चल रहा है. यह विशेष सप्ताह अगली पीढ़ी (जेनरेशन नेक्स्ट) से जुड़े विषयों पर केंद्रित है.

इसी श्रृंखला में बीबीसी हिंदी की टीम ने दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय, आरके पुरम के कुछ छात्र-छात्राओं से लाहौर के क्रेसेंट मॉडल स्कूल के विद्यार्थियों की बातचीत कराई.

दोनों ओर के बच्चों ने पहली बार अपने स्कूलों में बैठे-बैठे ही एक-दूसरे को देखा, हंसी और चिंताएँ बाँटीं और कई विषयों पर बातचीत की और यह सब संभव हुआ वेबकास्टिंग के ज़रिए.

इस कार्यक्रम के प्रोड्यूसर थे बीबीसी हिंदी के संवाददाता अपूर्वकृष्ण जिन्होंने दिल्ली से इस कार्यक्रम का संचालन किया. लाहौर में इसका संचालन बीबीसी उर्दू के संवाददाता वुसतउल्लाह ख़ान ने किया.

बात निकली तो...

बच्चों की बातें पहले तो बच्चों वाली रहीं पर बात में गंभीर विषयों पर भी काफी सार्थक बहस दोनों ओर से सुनने-देखने को मिली.

शुरुआत हुई ताजमहल से. दिल्ली से न्यौता गया कि लाहौर के बच्चे भारत आए तो उन्हें ताजमहल दिखाया जाएगा पर साथ में सवाल था कि हम वहाँ आए तो क्या दिखाओगे.

 शुरुआत हुई ताजमहल से. दिल्ली से न्यौता गया कि लाहौर के बच्चे भारत आए तो उन्हें ताजमहल दिखाया जाएगा पर साथ में सवाल था कि हम वहाँ आए तो क्या दिखाओगे.

जवाब मिला...लाहौर नहीं, पूरा देश दिखाएंगे. सभी महत्वपूर्ण इमारतों, जगहों पर लेकर जाएंगे.

फिर क्रिकेट, टीचरों की ओर से मिलने वाली सज़ा में मुर्गा बनना या हाथ उठाकर क्लास में खड़े रहना जैसे अनुभव बाँटे गए.

यहाँ से पाकिस्तान के गेंदबाज़ों की वाह-वाह थी तो वहाँ से सचिन और सहवाग की. दिल्ली के बच्चों ने तो साझा टीम बनाकर विश्वकप जीतने का प्रस्ताव तक रख डाला. हालांकि लाहौर के बच्चे इससे ज़्यादा सहमत नहीं दिखे.

फिर ठहाके लगे और जोश-सा भर आया. सोचिए क्यों. अरे शाहरुख़ और ऐश्वर्या रॉय पर बातचीत जो चल निकली. लाहौर में सभी बच्चे इनके दीवाने थे पर भारतीय बच्चों को पाकिस्तानी फ़िल्मों के बारे में जानकारी नहीं थी.

पूछ बैठे, क्या गांधी पर 'लगे रहो मुन्नाभाई' की तरह पाकिस्तान में जिन्ना पर भी कोई फ़िल्म बनी है. जवाब मिला...बनी तो पर कॉमेडी नहीं, गंभीर फ़िल्म.

'...कि यूँ होता तो क्या होता'

दिल्ली से सवाल गया, गांधी और विभाजन के बारे में क्या सोचते हो. लाहौर से जवाब मिला, एक अच्छा इंसान जिससे ग़लतियाँ भी हुई हैं. पलट कर जिन्ना की छवि के बारे में भारतीय सोच पर सवाल आया.

दिल्ली में बीबीसी की वेबकास्टिंग का कार्यक्रम
बच्चों के साथ अतिथियों ने भी अपने-अपने सुझाव बाँटे

फिर इतिहास से लेकर इंटरनेट और सहशिक्षा से लेकर बँटवारे तक सवाल होते रहे, जवाब मिलते रहे.

बुधवार की दोपहर जब बातचीत शुरू हुई तो दिल्ली से बच्चों का साथ देने पहुँचे एनसीईआरटी के निदेशक, डॉक्टर कृष्ण कुमार और लाहौर में बच्चों के साथ मौजूद थे इतिहासकार डॉक्टर मुबारक़ अली.

दोनों ओर से बच्चों की बातचीत पर अतिथियों ने एकमत होकर कहा. बच्चे कूटनीतिज्ञों की तरह सधी-सधी भाषा बोल रहे हैं.

डॉक्टर कृष्ण कुमार ने कहा कि इस बात को साफ़ तौर पर स्वीकारने की ज़रूरत है कि दोनों ओर जो किताबें पढ़ाई जा रही हैं, उनमें अधूरापन है. इसे दूर करके एक व्यापक इतिहास दोनों ओर पढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

वहीं डॉक्टर मुबारक़ अली ने कहा कि पाकिस्तान में गांधी को ग़लत बताया जा रहा है तो भारत में जिन्ना को. इस तरह की बातों से ऊपर उठने की ज़रूरत है.

...और आख़िर में, 'शुक्रिया बीबीसी'

बातें थीं कि ख़त्म नहीं हो रही थीं पर घड़ी शायद रोज़ से तेज़ चल रही थी. कार्यक्रम पूरा होने को आया तो बच्चों ने कहा, बीबीसी का सबसे ज़्यादा शुक्रिया क्योंकि जो कभी सोचा भी न था, आज वो हुआ...जो पूर्वाग्रह थे, लोग उनसे अलग हैं.

पूरी बहस का नतीजा कुछ यूँ निकला कि दोनों ओर का इतिहास याद करेंगे तो सिर्फ़ बातें और बुरे अनुभव सुनाते रह जाएंगे. क्यों न इतिहास को पीछे छोड़े...कल का भविष्य हम हैं. हम नए सिरे से शुरुआत करें.

फिर से संबंधों को सुधारने के वादे दोहराए गए. फिर से याद आईं सेवइयाँ और क़ुतुब मीनार. फिर से हुआ दोस्ती का वादा और मुस्कुराते, ताली बजाते सबने एक दूसरे को शुक्रिया कहा.

दिल्ली-लाहौर के बीच जुड़े तारदिल्ली-लाहौर वेबकास्ट
दिल्ली-लाहौर के बच्चों के बीच वेबकास्ट
लाहौर के बच्चेबच्चे लाहौर से
लाहौर के बच्चों ने बातें की दिल्ली के बच्चों से.
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