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सोमवार, 27 नवंबर, 2006 को 00:20 GMT तक के समाचार
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चरमपंथियों के वकील हैं शाहिद

शाहिद आज़मी
शाहिद आज़मी ने अपनी वकालत की पढ़ाई जेल में रहकर की

शाहिद आज़मी युवा और ख़ासे चर्चित वकील हैं.

मुंबई हाईकोर्ट में लोग उन्हें 'टेररिस्ट लॉयर' यानी 'आतंकवादी वकील' के नाम से जानते हैं.

इस नामकरण का असली ताल्लुक़ तो उनके काम से है लेकिन इस काम के पीछे उनकी पिछली ज़िंदगी भी है.

शाहिद आज़मी 'टेररिस्ट लॉयर' इसलिए हो गए क्योंकि मुंबई हाईकोर्ट में चरमपंथियों के लगभग सारे मुक़दमें वही लड़ रहे हैं.

यह नाम उन पर इसलिए भी चस्पा हो गया है क्योंकि आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में वह अपने सात दोस्तों के साथ 'टाडा' के तहत पकड़े गए और छह साल जेल में बिता चुके हैं.

7/11 के ब्लास्ट के बाद शाहिद एक बार फिर चर्चा में हैं और उन्हें राजनीतिक पार्टियों से धमकियाँ मिल रही हैं.

सज़ा का सबक

कहते हैं कि सज़ा से सबक मिलता है. ज़ाहिर है कि शाहिद को भी जेल की सज़ा से सबक मिला.

बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद हुए दंगों के दौरान शाहिद आज़मी को जब 'सिमी' से संबंधों के आरोप में पकड़ा गया तब उनकी उम्र थी सिर्फ़ 16 साल.

शाहिद आज़मी
शाहिद आज़मी मानते हैं कि हर अपराधी के दृष्टिकोण को समझना भी अहम होता है

वह ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि जब उन्हें दोस्तों के साथ पकड़ा गया तो वे कर क्या रहे थे, “मैं और मेरे दोस्त सामान्य लोगों पर हो रहे अत्याचार को रोकने के मक़सद से ‘आर्म्ड मिलिटैंट’ बनकर पुलिस को रोक रहे थे. फिर हमें 'टाडा' के तहत तिहाड़ जेल में छह साल के लिए रहना पड़ा था.”

लेकिन इन सालों में शाहिद ने जो सबक सीखा वह यह था कि अन्य लोगों की तरह बाहर निकलने के बाद उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया बल्कि जेल के अंदर ही अपनी पढाई पूरी की.

वह कहते हैं कि अपनी बात को सबके सामने रखने के लिए उन्होंने बाक़ायदा वकालत की पढ़ाई की.

जब शाहिद ने वकालत शुरु की तो उनके ज़हन में ऐसे ही लोग ज़्यादा थे जिनका मुक़दमा लड़ने को कोई तैयार नहीं होता था.

उन्होंने चरमपंथी गतिविधियों की वजह से पकड़े गए लोगों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए. फिर चाहे वो वे लोग हों जिन पर मुंबई ट्रेन ब्लास्ट में शामिल होने का आरोप हो या फिर मुलुंड, घाटकोपर या फिर गेटवे का ब्लास्ट हो, हर मामला उनके पास चला आता है.

 एक वकील होने के नाते मैं सिर्फ़ अपना काम कर रहा हूँ और मेरा फर्ज़ है कि मैं बेसहारा और बेगुनाह लोगों को बचाऊँ. मैं तो बत अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ
शाहिद आज़मी

शाहिद इसे ग़लत भी नहीं मानते, “किसी भी केस को वकील के हाथ में देने से पहले उसका वकील पर विश्वास करना बहुत ज़रूरी होता है. मैं खुद आगे जाकर किसी का केस नहीं लेता. मैं एक वकील हूँ और मेरा फर्ज़ है कि अभियुक्त और उसके परिवार के निर्देश के अनुसार ही काम करूं.”

वह कहते हैं, “एक वकील होने के नाते मैं सिर्फ़ अपना काम कर रहा हूँ और मेरा फर्ज़ है कि मैं बेसहारा और बेगुनाह लोगों को बचाऊँ. मैं तो बस अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ.”

शाहिद अपने साथ हुए 'अत्याचारों' को किसी और मासूम के साथ नहीं होने देना चाहते. हालांकि वह कहते हैं कि यदि कोई दोषी है तो बच नहीं सकता क्योंकि अंतिम निर्णय तो अदालत को ही देना है.

तमगा

अपने साथ जुड़े ‘टेररिस्ट लॉयर’ के तमगे को लेकर शाहिद न चिंतित हैं और न परेशान. वह कहते हैं, “आतंकवादियों के मामलों को लोग देशभक्ति के साथ जोड़ देते हैं. शायद इसीलिए ज़्यादातर वकील ऐसे मामले लेने से बचते हैं."

शाहिद कहते हैं, " अभियुक्त पहले ही अपने हालात, जनता और देश के माहौल बीच असहज महसूस करता है और उसपर अगर कोई साथ न हो तो वह और टूट जाता है."

शाहिद आज़मी
उनकी पिछली ज़िंदगी के कारण कई बार उन्हें अपमानित भी किया जाता है

ऐसे मुक़दमों के बारे में अपने अनुभव बताते हुए वह कहते हैं, “ऐसे मामलों में ज़्यादातर अभियुक्त एक सामान्य लड़का ही होता है जिसकी मुसीबतों की शुरूआत हो चुकी होती है और इस मुसीबत से बाहर आने के लिए उसे कई साल देने पड़ सकते हैं.”

शाहिद बताते हैं, “मैं उनके साथ बहुत ही नर्मी से पेश आता हूँ, उनके हाव-भाव और बातें भले ही एक अपराधी की तरह लगें लेकिन उसमें भी उनके प्वाइंट ऑफ व्यू होते हैं जो समझना बहुत ज़रूरी होता है.”

यह पूछने पर कि मुसलमानों को लेकर जो माहौल है उसे वह किस तरह देखते हैं, शाहिद कहते हैं, मुसलमानों को तो एक तरह के पक्षपात के माहौल में ही बड़ा होना होता है.

वह कहते हैं, "एक सामान्य भारतीय के लिए, मुसलमान अत्याचारी, आधा पढ़ा-लिखा और एक आतंकवादी होता है. स्कूल जानेवाले मुसलमान बच्चों को जब इतिहास पढ़ाया जाता है, जब वो रोज़ का अखबार पढ़ता है, वह उदास हो जाता है. दंगों में मुसलमानों को सबसे पहले दोषी माना जाता है.”

स्वागत भी, विरोध भी

शाहिद लोगों की नज़र में उस वक़्त आए जब उन्होंने मालेगाँव के डॉ. मोहम्मद शरीफ और औरंगाबाद के अनवर शेख का मामला लिया. इन लोगों को आरडीएक्स और एके-56 राइफल रखने के और महाराष्ट्र में आतंकवादी गतिविधियों को अंज़ाम देने के आरोप में आतंकवाद निरोधक दस्ते ने ‘मोका’ के तहत गिरफ़्तार किया था.

 शाहिद ने इस मुकाम पर पहुंचकर अपने कौम का सर तो ऊंचा किया ही है साथ ही पूरे समाज़ में अपने आपको एक ऐसे आदर्श के रूप में खड़ा किया हैं जिसकी लोग तारीफ़ भी करेंगे और उनके जैसा बनने की कोशिश भी करेंगे
ऋचा ललित तिवारी

शाहिद मानते हैं कि उनकी पिछली ज़िंदगी उनका पीछा आसानी से नहीं छोड़ती.

वह बताते हैं कि कई बार कोर्ट के अंदर उनके साथियों ने ही उनका पिछला रिकॉर्ड बताकर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की.

शाहिद याद करते हैं कि एक बार किसी ने उनके रिकॉर्ड से नीचा दिखाने की कोशिश की थी लेकिन फिर कोर्ट ऑफिसर ने उसे ऐसा करने से मना किया.

वह कहते हैं, "मेरे ख़याल से भारत में न्यायपालिका ही ऐसी जगह है जहाँ पर इस तरह के भेदभाव नहीं होते. मेरे अपने अनुभव ही मेरे बचाव और बहस करने का सहारा है और कई मामलों में मुझे इससे लाभ भी हुआ है.”

डी शिवानंद, डीसीपी, ठाणे
डीसीपी शिवानंद मानते हैं कि इससे दूसरे युवा भी सबक ले सकते हैं

लेकिन पुलिस अधिकारियों की राय कुछ अलग भी है.

ठाणे ज़िले के डीसीपी डी. शिवानंदन इसे एक अच्छी शुरूवात बताते हुए कहते हैं, “मुझे लगता है कि ऐसे लोगों की वजह से कई और लोगों में पढ़ने और कुछ करने का जज़्बा पैदा होता है और इस तरह के उदाहरणों से हमारे समाज पर सकारात्मक असर पड़ेगा”.

मुंबई हाईकोर्ट की वकील ऋचा ललित तिवारी भी इसे समाज़ के लिए एक अच्छी शुरुआत मानती हैं.

वह कहती हैं, “शाहिद ने इस मुकाम पर पहुंचकर अपने कौम का सर तो ऊंचा किया ही है साथ ही पूरे समाज़ में अपने आपको एक ऐसे आदर्श के रूप में खड़ा किया हैं जिसकी लोग तारीफ़ भी करेंगे और उनके जैसा बनने की कोशिश भी करेंगे.”

बहरहाल शाहिद आज़मी के पास पूरी उम्र पड़ी है और अपने आपको सही साबित करने के लिए सारा समय उनके पास है.

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