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सद्दाम पर भारत में भी जनमत बँटा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में जहाँ सुन्नी समुदाय के धार्मिक नेताओं ने सद्दाम हुसैन को फाँसी की सज़ा दिए जाने के फ़ैसले का विरोध कर रहा है वहीं कुछ शिया धार्मिक नेताओं ने इसे उचित ठहराया है. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम का कहना है कि इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा सुनाना इंसाफ़ का ख़ून करने जैसा है. उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले की सुनवाई में अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाई गई हैं. इमाम बुखारी ने कहा, "यह मुक़दमा जैसा कुछ भी नहीं है. सब सियासी तमाशा है. दरअसल यह सब कुछ अमरीका में दो दिनों बाद होने वाले चुनावों के मद्देनज़र किया गया है. इराक़ की जिस अदालत ने यह फैसला सुनाया है, वो तो अमरीका के हाथ की कठपुतली है." उन्होंने कहा कि सद्दाम ने अपने शासनकाल में जितने लोगों को मारा, उससे कहीं ज़्यादा लोगों को पिछले कुछ वर्षों में अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने इराक़ में मार डाला है. ऐसे में यह भी सोचना होगा कि बड़ा मुज़रिम कौन है, सद्दाम या बुश. इमाम ने कहा, "अगर यह मुक़दमा दुनिया की किसी दूसरे देश में चलाया गया होता और बुश को भी अभियुक्त बनाया गया होता तो पहले बुश को फाँसी होती, न कि सद्दाम को." स्वागत उधर शिया नेता और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक़ ने कहा है कि वो इस फैसले का स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा, "सद्दाम इससे भी ज़्यादा सज़ा के हक़दार हैं. मौत की सज़ा भी उनके लिए कम है. अगर संभव हो तो हम उन्हें रोज़ फाँसी दें." एक अन्य शिया नेता मौलाना मिर्ज़ा मोहम्मद अतहर ने कहा है कि सद्दाम को सिर्फ़ मौत की सज़ा ही दी जा सकती है. उन्होंने कहा, "इस मामले को अमरीका या यूरोप, शिया या सुन्नी या फिर अरब और ग़ैर-अरब के नज़रिए से देखना मुनासिब नहीं है. सद्दाम ने अपने देश में हज़ारों लोगों का कत्ल किया. ईरान से आठ बरस तक लड़ाई करके दोनों ओर के हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा. कुवैत जैसे छोटे से मुल्क पर हमला किया." मौलाना अतहर ने कहा, "अगर कोई एक आदमी किसी दूसरे आदमी का क़त्ल करता है तो उसे भी मौत की सज़ा होती है. इंसानियत के नाते सद्दाम की भूमिका को देखें तो उन्होंने हज़ारों बेगुनाहों का ख़ून किया है." उधर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता गुरदास दासगुप्ता ने कहा है कि वो इस फ़ैसले का विरोध करते हैं क्योंकि यह किसी अदालत का फ़ैसला नही, अमरीका का आदेश है. उन्होंने कहा कि यदि अमरीका इस मसले को लेकर वाकई गंभीर है तो इस मामले की सुनवाई अंतरराष्ट्रीय अदालत में होनी चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें सद्दाम हुसैन: बिना पटकथा का शो-मैन05 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा05 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम की सज़ा पर मिली-जुली प्रतिक्रिया05 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम हुसैन: ज़िंदगी का सफ़र05 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना अमरीकी चुनाव में इराक़ पर सवाल04 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना मलिकी ने सद्दाम के अपराधों की निंदा की04 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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