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मंगलवार, 17 अक्तूबर, 2006 को 11:45 GMT तक के समाचार
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असली जीत अब भी है बहुत दूर

प्रियदर्शिनी हत्याकांड पिछले छह वर्षों से सुर्ख़ियों में रहा
अगर कोई दोषी व्यक्ति अपने पिता के रोब-दाब की वजह से पहले छूट गया था और मीडिया के दबाव में ही सही, न्याय मिला तो यह निस्संदेह बहुत अच्छी बात है लेकिन बात यहाँ ख़त्म नहीं होती बल्कि यहीं से शुरू होती है.

उच्च मध्यवर्ग की पढ़ी-लिखी ख़ूबसूरत लड़कियाँ प्रियदर्शिनी मट्टू और जेसिका लाल,दोनों की हत्या को पूरे देश ने सपनों और संभावनाओं के अंत के रूप में देखा, उनके हत्यारों के बेदाग़ छूट जाने को न्याय की हार माना गया.

आख़िरकार प्रियदर्शिनी मट्टू के मामले में न्याय हुआ है,एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बेटे को हत्या और बलात्कार का दोषी पाया गया है.

छह वर्ष पहले जब संतोष के पिता पुलिस सेवा में थे तो उनके ख़िलाफ़ सबूत नहीं मिले थे और निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था लेकिन अब उनके पिता के रिटायरमेंट के बाद सीबीआई ने नए सिरे से जाँच की तो पर्याप्त सबूत मिल गए.

इसका मतलब भारत का एक-एक व्यक्ति समझता है जो हर रोज़ असर-रसूख वालों को बेफ़िक्री से क़ानून तोड़ते देखता है.

इसे न सिर्फ़ न्याय की जीत कहा जा रहा है बल्कि इसे मीडिया के दबाव का नतीजा भी माना जा रहा है.

इसमें कोई शक नहीं है कि टीवी चैनलों और ख़ास तौर पर अँगरेज़ी के अख़बारों ने प्रियदर्शिनी और जेसिका के मामले को बहुत ज़ोर-शोर से उठाया यानी लगभग रोज़ाना कवरेज करके इसे एक हाइ प्रोफ़ाइल केस बना दिया.

सवाल

मीडिया जिन मामलों को नहीं उठाता उनका क्या? जिन ग़रीब पिछड़े लोगों के साथ अन्याय हुआ है लेकिन उनमें प्रियदर्शिनी और जेसिका जैसी अपील नहीं है उनका क्या? मीडिया आख़िर कितने मामलों पर अभियान चलाए?

मीडिया इस बात पर ख़ुश हो सकता है उसके दबाव में न्याय हुआ है लेकिन बाक़ी देश के लिए यह चिंता की बात है कि ऐसी नौबत आए ही क्यों?

जब बिजली,पानी,सड़क अस्पताल, स्कूल वग़ैरह प्रशासन के चलाए नहीं चलते तो अदालत का दबाव होता है और जब न्याय प्रक्रिया पुलिस-जाँच में खोट या गवाहों के पलटने के कारण से नाकाम होती है वहाँ 'पॉपुलर अपील'के अनुपात में मीडिया का दबाव होता है.

लखनऊ में मेहर भार्गव की दिन-दहाड़े हत्या के बाद लखनऊ के लोग 'रंग दे बसंती'वाले अंदाज़ में मोमबत्तियाँ जलाकर सड़कों पर आ गए, उन्हें लगा कि इसी तरह मीडिया का ध्यान जाएगा, दबाव बनेगा और न्याय मिलेगा.

बड़े असर-रसूख वालों को उनकी करनी की सज़ा दिलानी है तो कितनी मोमबत्तियाँ जलानी होंगी, वेबसाइटों पर कितने हस्ताक्षर अभियान चलाने होंगे और मीडिया को कितने स्टिंग ऑपरेशन करने होंगे इसका कोई हिसाब नहीं है, और कितने लोग हैं जो ये सब कर सकते हैं.

कहा जा रहा है कि प्रियदर्शिनी मट्टू मामले में दोषी व्यक्ति को सज़ा मिलने से न्याय प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बढ़ेगा, लेकिन जो लाखों लोग अदालतों के धक्के खा रहे हैं उनसे पूछने पर ही शायद सही जवाब मिलेगा.

प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल, नीतिश कटारा, मेहर भार्गव, शिवानी भटनागर, इरफ़ान ये सब प्रतीक हैं न्याय प्रक्रिया की नाकामी के.

प्रतीकों से लोगों के सोचने का ढंग ज़रूर प्रभावित होता है, बदलता है लेकिन प्रतीकों से व्यवस्थाएँ नहीं चलतीं.

जब तक सचमुच की जीत नहीं मिलती तब तक ऐसी प्रतीकात्मक जीतों का स्वागत है, मिसाल क़ायम करना बहुत ज़रूरी है लेकिन एक अरब की आबादी वाले देश में एक-दो मिसालों से काम नहीं चलता.

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