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हिंदी का एक दिन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी में चौंतीस करोड़ मातृभाषी हैं. बोलने बरतने वाले पांच-छह करोड़ हैं. एक अरब की आबादी में चालीस करोड़ की भाषा है हिंदी. तब भी हिंदी क्यों दीन हीन दुखियारी सी दिखती है? भारत के सबसे ज़्यादा बिकने वाले पांच अख़बार हिंदी के हैं. हिंदी के सिर्फ़ एक अख़बार की प्रसार संख्या डेढ़ करोड़ है. इतनी तो सारे अंग्रेज़ी दैनिकों की मिलाकर नहीं बैठती. तो भी हिंदी की कदर क्यों नहीं है? क्यों हिंदी अंग्रेज़ी की उतरन लगती है. अंग्रेज़ी के मुकाबले उसका चेहरा बुझा बुझा सा रहता है? भारत के रेडियो, फ़िल्म उद्योग और टीवी उद्योग में हिंदी सबसे बड़ी भाषा है. वह सबसे बड़ी कमाई करने वाली भाषा है. अकेले टीवी चैनल एड रेवेन्यू का 40 से 45 फ़ीसदी हिस्सा हिंदी से आता है. तो भी हिंदी ग़रीबनी क्यों है? क्यों हिंदी वाले को अंग्रेज़ी वालों से कम मिलता है? अंग्रेज़ी क्यों चरम पर है? हिंदी क्यों बेदम है? जब-जब हिंदी दिवस आता है. हिंदी की दशा दिशा पर ध्यान जाता है. कुछ सवाल उठते हैं. मरते हैं. हम फिर भूल भालकर हिंदी की चिंदी करने लग जाते हैं. अनुवाद की भाषा हिंदी राजभाषा है. लेकिन राजकाज की भाषा नहीं है. राजकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही है. हिंदी अनुवाद की भाषा बना दी गई है. तो भी हिंदी है. खूब है. वह एक बड़ी जनता की भाषा है. वह दुनिया भर में सबसे ज़्यादा बोली बरती जाने वाली चीनी भाषा के बाद नंबर दो की भाषा है. वह ग़रीब जनों की भाषा है. उसमें 48 बोलियों का मिक्स है. उसमें इन दिनों तो तमिल, तेलुगू, पंजाबी, अंग्रेज़ी, अफ्रीकी भाषाओं तक के शब्द आते जाते हैं. वह सबसे बड़ी रीमिक्स की भाषा है. वह लगातार रोजमर्रा बनती हुई भाषा है. बहुत पहले वह उपदेश की भाषा की तरह बनी. फिर आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली, देश को एकजुट करने वाली भाषा बनी. वह नए विकास की भाषा भी बनी. तब राजनीति बीच में आ गई. अन्य भारतीय भाषाओं को उसके विस्तार, उसकी व्याप्ति से ख़तरा सा महसूस होने लगा. हिंदी को कई जगह दुश्मन मान लिया गया. हिंदी मगर कुछ न बोली. जुबाँ तक न खोली. फिर त्रिभाषा फार्मूला आया. फिर राजभाषा अधिनियम आया. लेकिन सरकार ने जब-जब हिंदी को छुआ. अन्य भाषाओं के कुछ तत्वों में उसका उतना ही विरोध हुआ. सरकार ने जितना भला किया उससे ज़्यादा उसका नुकसान हुआ. हिंदी का बाज़ार तब मीडिया आगे आया. फ्री मार्केट पर सवार मीडिया ने हिंदी का उद्धार किया. वह उपभोग का माध्यम बनी. 40 से 50 करोड़ का मार्केट एक भाषा में पकड़ में आता है. बस यहीं सारा खेल हो गया. हिंदी की तक़दीर जग गई. वह बाज़ार की भाषा बन गई. वह अमरीका, यूरोप, अफ्रीका, चीन, जापान इराक, ईरान, अफ़गानिस्तान में बाज़ार बनाने लगी. फ़िल्मों के रिलीज, कैसेट मार्केट पाने लगे. हिंदी मनोरंजन के उद्योग की भाषा बनी. यह पुरानी भाषा से अलग थोड़ी खिलंदरी, थोड़ी क्रीड़ा कौतुक वाली मिश्रित भाषा बनी. वह सबसे ज़्यादा बिकने वाली फ़िल्मों, अल्बमों, सीरियलों की भाषा बन उठी. विज्ञापनों की भाषा बन उठी. सूचना की भाषा बन उठी. आज की हिंदी इसी प्रक्रिया में बन रही है. यह शुद्ध कोशी साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी नहीं ही हो सकती. यह संचार और मनोरंजन की हिंदी है. यह उन्मुक्त हिंदी है. यह सरकारी हिंदी नहीं है. वह दलितों, ओबीसी की भाषा बनी है. इससे नई समस्याएँ पैदा हुई हैं. साहित्यकार इसे साहित्यिक नहीं मानते. यह स्तरीय नहीं मानी जाती. और वह भी ठहर कर देख नहीं पा रही कि पिछले दस-पंद्रह साल की तीव्र भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में वह किस गति को प्राप्त हुई है. ज़रूरत ऐसे शोध और अध्ययन की आन पडी है जो समकालीन हिंदी की समस्याएँ समझे. अंग्रेज़ी समेत अन्य भारतीय भाषाओं से अपने संबंध स्पष्ट करते हुए वह सिर्फ़ मनोरंजन की भाषा बनकर धन्य न हो बल्कि हिंदी में नए ज्ञान के निर्माण की, नए जनसंचार की, नई जन आकुलताओं की भाषा बने. | इससे जुड़ी ख़बरें हिंदी और वेल्श में है काफ़ी समानताएँ15 मार्च, 2005 | पहला पन्ना बीबीसी वर्ल्ड सर्विस लाएगी अरबी चैनल25 अक्तूबर, 2005 | पहला पन्ना उगते सूर्य के देश के हिंदीप्रेमी14 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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