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अफ़सरी का घटता आकर्षण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की सरकारी मशीनरी में इंडियन ऐडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस या आईएएस को रीढ़ की हड्डी की हैसियत हासिल है, इसके असाधाराण अधिकार और असर-रसूख़ के कारण आईएएस की नौकरी को बड़े सम्मान की नज़र से देखा जाता है. लेकिन अब कई अधिकारियों ने आईएएस का पद छोड़कर ग़ैर-सरकारी संगठनों की ओर जाना शुरू कर दिया है. अभी हाल ही में आंध्र प्रदेश में एक के बाद एक चार आईएएस अधिकारियों ने इस्तीफ़ा दे दिया और दूसरी ज़िम्मेदारियाँ संभाल लीं. उन में से एक जेसी मोहंती 27 वर्ष तक उच्च पदों पर काम करने के बाद अब अपने प्रदेश उड़ीसा जा रहे हैं जहाँ वे ग़ैर-सरकारी संगठन से जुड़कर ग़रीबी उन्मूलन करने के लिए काम करना चाहते हैं. एक और अधिकारी मनोहर प्रसाद आंध्र प्रदेश में ही रहकर गाँवों के विकास के लिए काम करना चाहते हैं. उन्होंने 17 सालों तक आईएएस रहने के बाद यह क़दम उठाया है. दूसरे दो अधिकारी निजी कंपनियों में चले गए हैं. वास्तव में यह सिलसिला कोई 10 वर्ष पूर्व उस वक़्त शुरू हुआ था जब एक नौजवान आईएएस अधिकारी डॉक्टर जयप्रकाश नारायण सरकारी विभाग के चमकते भविष्य को त्याग कर सरकार से अलग हो गए और अपनी एक सामाजिक संस्था बना ली. जयप्रकाश नारायण का कहना है कि आइएएस अधिकारियों के नौकरी छोड़ने के कई कारण हो सकते हैं, "कुछ अधिकारी ऐसे हैं जो बीस साल की सर्विस के बाद इसलिए अलग हो जाते हैं कि उन्हें पेंशन मिलनी शुरू हो जाती है और वे बाहर भी काम कर सकते हैं जबकि कुछ लोग अपने काम से असंतोष की वजह से दूसरे कामों की ओर आकर्षित होते हैं." नारायण अपने आप को दूसरी श्रेणी में रखते हैं क्योंकि जब उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था तब तक उन्होंने इतने समय तक नौकरी नहीं की थी कि उन्हें पेंशन मिल सके. उनका कहना है, "कुछ लोग यह सोच कर आईएएस में आते हैं कि वह जनता के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन कुछ समय बाद उन्हें यह एहसास होने लगता है कि इस सर्विस में इतनी बंदिशें हैं कि वह अपनी आशाओं के अनुसार काम नहीं कर सकते हैं. ऐसा महसूस करने वालों की संख्या तेज़ी और बढ़ सकती है." असंतोष सरकारी प्रशासन से कुछ इस प्रकार के असंतोष के साथ गुजरात के सीनियर अधिकारी हर्ष मंदेर ने भी 2001 के सांप्रदायिक दंगों के बाद सरकारी पद से इस्तीफ़ा दे दिया था और एक ग़ैर सरकारी संस्था में शामिल हो गए थे.
जहाँ एक ओर जयप्रकाश, मोहंती और मनोहर प्रसाद जैसे अधिकारी हैं वहीं साम्बा शिव राव जैसे आईएएस अधिकारी भी हैं जिन्होंने कार्पोरेट दुनिया का रुख़ किया है. एक बड़ी डेयरी कंपनी हेरीटेज फ़ूड में शामिल हो गए हैं क्योंकि उन्हें यह लगता है कि वहाँ वे अधिक अच्छे तौर पर काम कर सकते हैं. इसी प्रकार मध्य प्रदेश के सुनील टंडन और तामिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी एल कृष्णन भी बड़ी निजी कंपनियों में चले गए हैं जहाँ उन्हें सरकारी वेतन के मुक़ाबले कहीं अधिक पैसे की पेशकश की गई है. जब से भारत में निजी विभाग की कंपनियों तेज़ी से विकास करने लगी हैं और आर्थिक विकास की रफ़तार तेज़ हुई है तब से ही कॉर्पोरेट विभाग सरकारी सेवा के मुक़ाबले कहीं अधिक आकर्षण का केंद्र बन गया है. | इससे जुड़ी ख़बरें अभावों के बीच शिखर पर पहुँचे हैं शुभम22 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'कर्मचारी बताएँ, दहेज लिया या नहीं'03 मई, 2005 | भारत और पड़ोस सिविल सेवा परीक्षा में सफलता का राज़14 मई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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