 |  सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिया |
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे अपने सभी पुरुष कर्मचारियों से यह जानकारी लेने पर विचार करें कि उन्होंने नौकरी में आने से पहले दहेज लिया था या नहीं. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कर्मचारी प्रशासनिक अधिकारी हों या क्लर्क, उन्हें ये घोषणा करनी चाहिए कि उन्होंने दहेज लिया है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया है कि वह सभी प्रकार की सरकार नौकरियों की नियमावली में इसे शामिल करे. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरसी लाहौटी, जस्टिस जीपी माथुर और जस्टिस पीके बालासुब्रमण्यम की खंडपीठ ने अपने प्रस्ताव में कहा, "हम केंद्र और राज्य सरकारों को ये निर्देश देते हैं कि वे इस बात पर विचार करें कि सरकारी नौकरियों के दावेदारों से दहेज के बारे में जानकारी भी ली जाए. साथ में उनसे भी दहेज के बारे में जानकारी ली जाए जो पहले से ही सरकारी नौकरी में मौजूद हैं."  |  भारत में दहेज प्रथा का अभी भी बोलबाला है |
अगर केंद्र और राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती हैं- तो सरकारी नौकरियों के उम्मीदवार या पहले से सरकारी नौकरी में मौजूद लोगों को दहेज के बारे में जानकारी देनी होगी. भारत में दहेज निरोधक क़ानून 43 साल पहले 1961 में बना था. इस क़ानून के अनुसार दहेज लेने या देने के दोषी पाए गए व्यक्ति को पाँच साल की क़ैद और 15 हज़ार रुपए का जुर्माना हो सकता है. खंडपीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि इतने सालों से दहेज निरोधक क़ानून के रहते केंद्र और राज्य सरकारों ने इसे लागू कराने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किया. |