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रविवार, 27 अगस्त, 2006 को 12:24 GMT तक के समाचार
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जंतर मंतर और लोकतंत्र

प्रदर्शनकारी
कहीं आदिवासियों के अधिकार तो कहीं सिखों के अधिकार के लिए धरना हो रहा है
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सफलता को लेकर भले ही सवाल उठाए जाते रहें हों लेकिन भारतीय संसद के पास जंतर मंतर पर इसकी मिसाल देखते ही बनती है.

पिछले दिनों आरक्षण के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के लिए बार-बार जंतर-मंतर की ओर जाना हुआ. इस दौरान जो नज़ारा देखा वो भारत में ही संभव है.

इसे एक वाक्य में कहूँ तो उत्तर भारतीय थाली में दक्षिण भारतीय खाना कहूँ या हिंदू की थाली में मुसलमान के घर की बनी रोटी खाता सिख. या फिर गणतंत्र दिवस पर निकलने वाली झांकी.

हुआ यूँ कि जंतर मंतर पहुंचा था आरक्षण की रैली पर रिपोर्टिग के लिए लेकिन रास्ते में सबसे पहले था कुछ लोगों का झुंड.

भगवा कपड़े पहने ये लोग गो-रक्षा का नारा लगा रहे थे. मांस के निर्यात पर प्रतिबंध और सभी जीवों की हत्या पर रोक इनकी मांगें थीं. नारा था 'हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, गोरक्षा मे सबकी भलाई'. ऊपर से हवाला गांधी जी का.

इसके ठीक सामने थी ऑल इंडिया मुन्नानी कांफ्रेंस की रैली. मेंहदी में रंगी दाढ़ियों, सफेद टोपी वाले मौलाना और बुर्काधारी औरतें सब विरोध कर रहे थे मुंबई में मुसलमानों के साथ हो रहे कथित दुर्व्यवहार का.

लोकतंत्र के रंग

अभी मैं इन हिंदू मु्स्लिम प्रदर्शनों को हजम कर भी न पाया था तो देखा कि ढेर सारे सिख जंतर मंतर की तरफ आ रहे थे. 60 से ऊपर की उम्र वाले ये सारे सिख आते ही सड़कों पर जहाँ छाया मिली, बैठ गए. बड़ा मुश्किल था जानना कि वो क्या करना चाहते हैं क्योकि उनके भाषण पंजाबी में, पर्चे पंजाबी में और लोग भी पंजाबी में ही बतिया रहे थे.

प्रदर्शनकारी
गोरक्षा के समर्थन में होता प्रदर्शन

खैर इन तीनों को छोड़ आगे निकला तो पाया कि उत्तर पूर्व के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में धरने पर बैठे हैं. अब मैं अचंभे में था कि क्या सारा भारत यहीं मिल जाएगा.

हर आदमी अपनी भाषा में अपने तरीके से अपनी शैली में विरोध कर रहा था.

सामने ही आदिवासियों के अधिकारों को लेकर भी रैली जारी थी. पता चला कि ये लोग भी कई दिनों से धरने पर हैं.

कोई नेता आता है या नहीं इससे कोई मतलब नहीं. इस उम्मीद पर कि बात सुनी जाएगी, धरने जारी हैं. अपनी बात कहनी है. अपना विरोध जताना है.

इन्हीं धरने रैलियों के बीच कहीं-कहीं छोटे-छोटे धरने अपने तौर पर जारी थे जिन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था.

वो तो बस जैसे लोकतंत्र की रवायत पूरी कर रहे थे. उन्हें बोलने का हक दिया गया था और वो बिना किसी परेशानी के इसका पालन कर रहे थे.

ख़ैर अपनी नियत रैली यानी आरक्षण वाली रैली में डॉक्टरों को भी देखा और एक राजनीतिक दल की रैली भी देखी जो अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण नहीं देने का विरोध कर रहे थे.

भारत का कोरम लगभग पूरा हो चुका था. हिंदू मुस्लिम, सिख, आदिवासी, अल्पसंख्यक, बस सौ मीटर में लोकतंत्र की मशाल जगाए इन सबको देख चुका था.

हाँ, दो और शख्सियतें अक्सर लोकतंत्र के इस चौराहे पर दिखती हैं.

पहली तो खाकी वर्दी में पुलिसवाले. कभी-कभी आँसू गैस, लाठी और बंदूकों के साथ. दूसरी होती है मीडिया की. अपने कैमरों, कलम, कागज़ों और माइकों के साथ.

इनका सीधा सिद्धांत है. अपना काम किया और चल दिए. रह जाते हैं लोग लोकतंत्र की मशाल जगाते हुए जंतर मंतर पर.

शायद तभी एक सरदार ने जाते-जाते मुझसे कहा, "लोकतंतर है हम अपनी बात कहने आए हैं जंतर मंतर पर."

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