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मंगलवार, 11 जुलाई, 2006 को 00:21 GMT तक के समाचार
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'कोलेर' झील को मिली नई जिंदगी

झील
प्रशासन के मुताबिक मत्स्यपालन के कारण झील अपना पुराना स्वरूप खो रहा था
सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद दक्षिण भारतीय राज्य आँध्रप्रदेश में स्थित ताज़े पानी की कोलेर झील को एक नई ज़िंदगी मिली है.

एशिया में ताज़े पानी की बड़ी झीलों में शुमार कोलेर पिछले चार वर्षों से अस्तित्व बचाए रखने के लिए जूझ रहा था.

यह बंगाल की खाड़ी के तट पर पश्चिमी गोदावरी और कृष्णा ज़िले के बीच 900 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार स्थानीय प्रशासन ने इस झील में ग़ैर क़ानूनी तौर पर बनाए गए मछली पालने के तालाबों को तोड़ दिया है.

तीन माह तक चली इस कार्रवाई में 1700 फिश टैंक्स को तोड़ दिया गया और इसके लिए कुछ स्थानों पर धमाके भी किए गए.

इस तरह झील की 44 हज़ार एकड़ ज़मीन को वापस हासिल किया गया और पानी का बहाव आसान बनाने का रास्ता साफ हुआ.

यह झील प्रवासी पक्षियों का पसंदीदा जगह रही है. सदियों से साइबेरिया और दुनिया के दूसरे हिस्सों से पक्षियों का झुंड ख़ास समय पर यहां आते हैं.

जबसे झील में तिजारती पैमाने पर मछली पालन का सिलसिला शुरू हुआ, तभी से यहाँ का वातावरण ख़राब हो गया.

झील को उसका पुराना आकार देने में थोड़ा समय लगेगा. इसलिए प्रशासन ने इस इलाके के पक्षियों के लिए अस्थायी तौर पर एक सुरक्षित जगह बनाई है.

जनसंगठनों के मुताबिक मछली पालन बंद करने से डेढ़ लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं

फिश टैंक्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई की दूसरी बड़ी वजह ये थी कि पानी के बहाव का रास्ता न मिलने की वजह से हर साल बड़े पैमाने पर बाढ़ आ रही थी और लाखों एकड़ में लगी फसलों को क्षति पहुँच रही थी.

रोजगार

अब जहाँ विशेषज्ञ और सरकारी अधिकारी अपनी इस कामयाबी पर प्रसन्न हैं, वहीं ग़ैर सरकारी संगठन और स्थानीय लोग सख़्त नाराज़ हैं.

उनका कहना है कि मछली के तालाबों को हटाने से डेढ़ लाख लोगों का रोज़गार प्रभावित हुआ है और इन दोनों ज़िलों की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है.

ग़ैर सरकारी संगठन लोकसत्ता के कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस अधिकारी जे प्रकाश नारायण का कहना है कि शासन ने प्रभावित होने वाले लोगों के पुनर्वास के बारे में सोंचे बग़ैर ये कार्रवाई की है.

उनका कहना है कि झील की जो ज़मीने प्रशासन ने वापस ली है, उनमें 20 हज़ार एकड़ ज़मीन लोगों की निजी संपत्ति और 10 हज़ार एकड़ ज़मीन खुद राज्य सरकार की थी.

कोलेर झील विदेशी पक्षियों का पसंदीदा पनाहगार है

यूएन के खाद्य और कृषि संगठन एफएओ के पूर्व एम्बेसडर और मत्स्यपालन उद्योग के विशेषज्ञ डॉक्टर पार्थसार्थी का कहना है कि राज्य सरकार की इस कार्रवाई से सिर्फ़ मछली पालन उद्योग ही नहीं बल्कि इससे जुड़े कई दूसरे उद्योग भी तबाह हो गए हैं.

स्थानीय नागरिकों की नाराज़गी से ऐसा लगता है कि अगर सरकार पुनर्वास और उनके रोज़गार के लिए जल्द कोई क़दम नहीं उठाती है तो एक बड़ा आंदोलन शुरु हो सकता है.

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