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'मैं आज भी बाज़ार में बैठी हूँ' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं आंध्रप्रदेश के एक छोटे से गांव में रहती थी. घर पर अम्मी और अब्बा (माता-पिता) के अलावा हम छह भाई-बहन थे. थोड़ी-सी ज़मीन थी जिस पर अब्बा खेती किया करते थे. जैसा कि गाँवों में शादी जल्दी कर दिया करते हैं मेरी भी मंगनी 13 बरस की उम्र में कर दी गई. दुखों की कहानी यहाँ से शुरू हुई. मंगनी के कुछ दिन बाद ही अब्बा गुज़र गए. शादी तो अम्मी ने जैसे-तैसे कर दी लेकिन शादी के महीने भर बाद ही सुसराल वालों ने अनाज, ज़मीन और बैल की मांग शुरू कर दी. मेरी माँ यह सब पूरा नहीं कर पाई. शादी के छह महीने बाद मेरा तलाक़ हो गया और मैं वापस अपनी माँ के घर आ गई. एक दिन ग़रीबी और गाँववालों की बातों से तंग आकर अम्मी ने किसी रिश्तेदार के कहने पर मुझे दूसरों के घरों में काम करने के लिए मुंबई भेज दिया. ग़रीबी मुंबई में मैं सफाई-बर्तन का काम करने लगी. इसी दौरान मैं एक ऐसी औरत से मिली जो पेशे से यौनकर्मी थी. उस यौनकर्मी ने पैसों का लेखा-जोखा इस तरह मेरे सामने रखा कि नासमझी और ग़रीबी ने मुझे सोचने की मोहलत ही न दी. मैं उस यौनकर्मी के नक्शे क़दम पर चलने लगी. इस पेशे के दौरान मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिससे मिल कर मुझे लगा कि यही वह व्यक्ति है जिसकी मुझे तलाश थी. उस आदमी ने मुझसे कानूनी तौर पर शादी की और मै गृहस्थ जीवन में आ गई. क़रीब 15 बरस की इस गृहस्थी ने मुझे परेशानियों के साथ-साथ तीन बच्चों की ज़िम्मेदारी भी दे दी. मेरे पति का रवैया दो-तीन वर्ष बाद ही बदल गया था. वह अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय और पैसा कोठों पर ख़र्च करता था. रोज़-रोज़ की तू-तू, मैं-मैं और हर बार उसका यह कहना कि 'तुझे मैं कोठे से लाया हूँ' ने मेरे सब्र का बांध तोड़ दिया और मैं बच्चों के साथ दिल्ली आ गई. दिल्ली आकर मैंने एक किराए के मकान में सिलाई-बुनाई का काम शुरू किया लेकिन उससे मिलने वाले पैसे गुजारे के लिए क़ाफी नहीं थे. मेरी परेशानियों को देखकर मकान मालिक ने सुझाव दिया कि जेद्दा में एक शेख परिवार को घर के काम के लिए किसी की ज़रूरत है और अगर मैं चाहूँ तो वहाँ जा सकती हूँ. मेरे पास सोचने की मोहलत कहाँ थी? मैंने बच्चों को माँ के हवाले किया और जेद्दा रवाना हो गई. बदकिस्मती वहाँ भी मेरी बदक़िस्मती ने मेरा साथ नही छोड़ा. मुझे लेकर हर रोज़ उस शेख़ परिवार के बाप-बेटों में झगड़ा होने लगा. वह लोग अरबी में बात करते थे जो मेरी समझ से बाहर थी. मैंने उनकी लड़ाई का कारण एक हिन्दुस्तानी ड्राइवर की मदद से जाना और वह यह था कि वे दोनों ही मुझसे शादी करना चाहते थे.
मैंने उस ड्राइवर से वापस भारत जाने के लिए मदद माँगी तो उसने मुझे सुझाया कि मैं शेख़ों से कहूँ कि मुझे टीबी की बीमारी है. शेख़ लोग टीबी के मरीज़ को फ़ौरन वापस भेज देते हैं. दूसरे दिन ड्राइवर ने मुझे हज कमेटी वालों से मिलवाया. उन दिनों हज कमेटी वाले भारत से आए हुए थे. मैंने हज कमेटी वालों को अपनी कहानी सुनाई और बीमारी का ज़िक्र भी किया. हज कमेटी वालों ने शेखों को मेरी बीमारी के बारे में बताया और कहा कि मुझे जाने दें. शेख़ इस पर भी मुझे छोड़ने के लिए राज़ी न हुए और मुझे अस्पताल में दाख़िल करवा दिया गया. एक महीने अस्पताल में रहने के बाद एक डाक्टर और नर्स की मदद से मैं किसी तरह दिल्ली आ गई. अब तक मेरी हिम्मत टूट चुकी थी. मेरे तीनों बच्चे 12वीं तक पढ़े हैं और आज बेहतर ज़िंदगी जी रहे है. और मैं, मैं एक बार फिर उल्टे क़दमों से कोठे की सीढ़ियाँ चढ़ गई और तब से अब तक बाज़ार में बैठी हूँ. हालांकि आज भी ज़िंदगी उलझनों और परेशानियों से भरी हुई है लेकिन कुछ ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करती हूँ और उसी में सुकून की तलाश करती हूँ. मैंने अपना नाम आपको नहीं बताया, लेकिन इससे क्या बदल जाएगा. आप चाहें जिस नाम से मुझे पुकार लीजिए. (यह दास्तान बयान करने वाली एक यौनकर्मी है जिसने सूफ़िया शानी से बातचीत की) | इससे जुड़ी ख़बरें यौनकर्मियों ने बदलावों का विरोध किया09 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस कोलकाता में वेश्याओं का 'अपना बैंक'10 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस मधुसूदनपुर में वेश्यावृत्ति ज़िंदगी का हिस्सा 30 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस अभिनेत्रियाँ और मॉडल कर रही हैं देह व्यापार?12 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस थाईलैंड में वेश्यावृत्ति को लेकर बहस27 नवंबर, 2003 | पहला पन्ना एक इश्तहार ऐसा भी . . .11 जुलाई, 2003 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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