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सोमवार, 05 जून, 2006 को 09:48 GMT तक के समाचार
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'ब्लू लेडी' को भारत आने की अनुमति
जहाज़
बांग्लादेश ने इस जहाज़ को अपने यहाँ लाने से मना कर दिया है
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने एसबेस्टस जैसे ज़हरीले पदार्थ से लदे मलेशिया के एक जहाज़ ब्लू लेडी को भारत के जल क्षेत्र में प्रवेश करने और गुजरात के अलंग शिपयार्ड में रुकने की अनुमति दे दी है.

यह अनुमति इस मामले की पड़ताल के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर दी गई है.

एसएस नॉर्वे के नाम से भी जाना जा रहा यह जहाज़ मलेशिया से भारतीय राज्य गुजरात के अलंग शिपयार्ड में लाया जाना है. यहाँ इस जहाज़ को तोड़कर एसबेस्टस निकालने का काम किया जाएगा.

समिति की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा है कि अगले कुछ समय में मानसून के कारण मानवीय आधार पर इस जहाज़ को भारतीय जल क्षेत्र में आने और गुजरात के तटीय क्षेत्र में रुकने की अनुमति दे दी गई है.

हालांकि इस बात पर अंतिम फ़ैसला होना अभी बाक़ी है कि इस जहाज़ को भारत में तोड़ने की अनुमति मिलेगी या नहीं.

विरोध

उधर इस जहाज़ को भारत लाने का विरोध कर रहे जनसंगठनों ने उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट पर ही सवाल उठाए हैं.

संगठनों ने जहाज़ को भारत लाने को अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के ख़िलाफ़ बताया है.

संगठनों की ओर से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है. इस मसले पर जुलाई महीने में अगली सुनवाई होनी है.

 सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस उच्च स्तरीय कमेटी का अध्यक्ष पर्यावरण मंत्रालय के सचिव प्रदीप्तो घोष को बनाया गया है जबकि इसी मंत्रालय के ख़िलाफ़ ज़हरीले पदार्थों को भारत लाने के मुद्दे पर वर्ष 1995 से सुप्रीम कोर्ट में एक मुक़दमा चल रहा है
गोपाल कृष्ण, संयोजक, बानी

बैन एस्बेस्टस नेटवर्क ऑफ़ इंडिया(बानी) के संयोजक गोपाल कृष्ण ने बीबीसी को बताया कि उच्च स्तरीय समिति ने इस जहाज़ को भारत लाने से संबंधित क़ानूनी पक्ष का न तो पालन किया है और न ही अपनी रिपोर्ट में इस बारे में कुछ कहा है.

उन्होंने बताया, "सबसे ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि इस उच्चस्तरीय कमेटी का अध्यक्ष पर्यावरण मंत्रालय के सचिव प्रदीप्तो घोष को बनाया गया है जबकि इसी मंत्रालय के ख़िलाफ़ ज़हरीले पदार्थों को भारत लाने के मुद्दे पर वर्ष 1995 से सुप्रीम कोर्ट में एक मुक़दमा चल रहा है."

गोपाल कृष्ण ने बताया, "सवाल तो इस कमेटी के गठन और उसकी निष्पक्षता को लेकर भी है क्योंकि इस कमेटी में ट्रेड यूनियनों से भी कोई प्रतिनिधि नहीं लिया गया है."

ग़ौरतलब है कि एसबेस्टस के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रभावों को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इसे अपने यहाँ प्रतिबंधित कर रखा है.

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