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सोमवार, 29 मई, 2006 को 09:31 GMT तक के समाचार
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आरक्षण पर केंद्र सरकार को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि यह व्यवस्था किस आधार पर लागू की जा रही है.
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उसने किस आधार पर अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया.

जस्टिस अरजित पसायत और एलएस पंटा की खंडपीठ ने छात्रों से भी हड़ताल वापस लेने की अपील की और कहा कि अदालत इस मामले पर विचार कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी कर पूछा है कि वे इस नीति को लागू करते वक्त क्या तरीका अपनाएँगे.

साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार से यह सवाल भी उठाया है कि अन्य पिछड़ी जातियों की पहचान का आधार क्या होगा.

इस नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है.

ग़ौरतलब है कि इस मामले में शिव खेड़ा और अशोक कुमार ठाकुर दो लोगों ने याचिकाएँ दायर की थीं.

हड़ताल जारी

हड़ताल पर बैठे मेडिकल छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट की अपील को मानने से इनकार कर दिया है.

एम्स के रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विनोद पात्रा ने बीबीसी को बताया, "हम सुप्रीम कोर्ट की अपील के बाद अपनी हड़ताल ख़त्म नहीं कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि सरकार पिछले 60 वर्षों से देश में लागू आरक्षण व्यवस्था का विश्लेषण करे और वैज्ञानिक आधार पर इस मुद्दे को देखा जाए."

हालांकि उन्होंने बताया कि इससे मरीज़ों को हो रही असुविधा को देखते हुए कल से ओपीडी की सेवाओं पर डॉक्टर आना शुरू हो जाएँगे ताकि बाहर से आ रहे मरीज़ों को परेशानियों का सामना न करना पड़े.

प्रस्ताव नामंज़ूर

भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों मे अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का विरोध कर रहे मेडिकल छात्रों ने रविवार को प्रधानमंत्री के एक नए लिखित प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था.

इस प्रस्ताव में हड़ताल कर रहे छात्रों को यह लिखित आश्वासन दिया गया था कि नई आरक्षण व्यवस्था के लागू होने से सामान्य वर्ग की सीटों की संख्या में कोई कमी नहीं होनी दी जाएगी.

प्रस्ताव में कहा गया था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में सीटों की संख्या बनी रहे इसके लिए केंद्र सरकार विषेशज्ञों की कुछ समितियों का गठन करेगी. ये समीतियाँ अगले एक वर्ष में इसे लागू कराने की तैयारी करेंगी.

छात्रों ने सरकार के इस नए प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया है.

ग़ौरतलब है कि आरक्षण के विरोध में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों को एक महीने से भी ज़्यादा वक्त हो चुका है. इससे सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है.

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