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सोमवार, 27 मार्च, 2006 को 11:43 GMT तक के समाचार
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सज़ा माफ़ी के विरोध में प्रदर्शन
अब्दुल रहमान
अब्दुल रहमान के मामले में अफ़ग़ानिस्तान सरकार पर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव था
अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम छोड़कर ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले एक व्यक्ति के मामले को ख़त्म करने के फ़ैसले के विरूद्ध हज़ारों अफ़ग़ान नागरिकों ने प्रदर्शन किए हैं.

एक अधिकारी ने कहा है कि अब्दुल रहमान नाम के इस अफ़ग़ान नागरिक के मामले को वापस एटॉर्नी जनरल के पास भेज दिया गया है क्योंकि इस मामले के सुबूतों में कई ख़ामियाँ थीं.

अब्दुल रहमान के मामले ने अंतरराष्ट्रीय जगत में काफ़ी तूल पकड़ा था और अमरीका समेत कई देशों ने इसे लेकर अफ़ग़ानिस्तान सरकार पर दबाव डालना शुरू किया था.

16 साल पहले ईसाई धर्म को स्वीकार करनेवाले अब्दुल रहमान पर इस्लाम की अवहेलना का आरोप लगा था और दोबारा इस्लाम स्वीकार नहीं करने की सूरत में उन्हें मौत की सज़ा दी जा सकती थी.

अब अब्दुल रहमान की रिहाई की ख़बर तो आई है लेकिन तनाव को देखते हुए इसका ब्यौरा गुप्त रखा गया है कि रिहाई कब और कैसे होगी.

प्रदर्शन

सोमवार सुबह 1000 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने मज़ार-ए-शरीफ़ में सड़कों पर निकलकर प्रदर्शन किए.

प्रदर्शनकारी अब्दुल रहमान के विरूद्ध मुक़दमा चलाए जाने और उन्हें मौत की सज़ा देने की माँग कर रहे थे.

उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति बुश के ख़िलाफ़ भी नारे लगाए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस मामले से दूर रहने की चेतावनी दी.

उनका कहना था कि अफ़ग़ानिस्तान का संविधान इस्लाम पर आधारित है जिसका सम्मान होना चाहिए.

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है हालाँकि उन्हें एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय दबाव को झेलना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ़ अपने देश में कट्टरपंथियों का दबाव.

मानसिक मामला

इससे पहले अब्दुल रहमान के परिवार के लोगों ने ये कहते हुए अदालत से इस मामले को रद्द करने की माँग रखी थी कि अब्दुल रहमान मानसिक रूप से बीमार हैं.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने भी बीबीसी को बताया कि इस बात को लेकर पूरा संदेह है कि अब्दुल रहमान मुक़दमे का सामना करने लायक हैं कि नहीं.

न्यायाधीश ने ये भी कहा कि उन्हें ये भी स्पष्ट नहीं है कि अभियुक्त वाकई अफ़ग़ान नागरिक है या किसी और देश का रहनेवाला है.

अब्दुल रहमान 16 वर्षों तक अफ़ग़ानिस्तान से बाहर रहे और समझा जाता है कि जर्मनी में प्रवास के दौरान ही उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया.

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