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बुधवार, 22 मार्च, 2006 को 03:30 GMT तक के समाचार
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धर्मांतरण के कारण 'मौत के मुँह में'
अब्दुल रहमान
अब्दुल रहमान ने फिर से धर्मांतरण से इंकार कर दिया है
अफ़ग़ानिस्तान के अब्दुल रहमान मुसलमान से ईसाई होकर मौत के मुँह में फँस गए हैं.

शरिया क़ानूनों के अनुसार इस धर्मांतरण के लिए अब्दुल रहमान को मौत की सज़ा दी जा सकती है.

इससे बचने का उनके पास एक ही रास्ता है कि वो फिर से मुसलमान हो जाएँ.

इस मामले पर अमरीका और नैटो के तीन सदस्य देशों ने चिंता ज़ाहिर की है.

अमरीका ने कहा है कि उस व्यक्ति को किसी भी धर्म का पालन करने की अनुमति दी जानी चाहिए. हालांकि इसके साथ ही अमरीका ने स्पष्ट भी किया है वो इसमें कोई दखलंदाज़ी नहीं करना चाहता.

इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में शांति सैनिक भेज चुके जर्मनी, कनाडा और इटली ने इस मामले को लेकर चिंता जताई है.

उधर वॉशिंगटन स्थित अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास में सैकड़ों अमरीकी नागरिकों ने चिंता ज़ाहिर करते हुए पत्र भेजे हैं.

मामला

अब्दुल रहमान 41 साल के हैं और उन्होंने 16 साल पहले मुसलमान से ईसाई होने का फ़ैसला किया था.

जज के हाथों में बाइबल
जज का कहना है कि ये बाइबल अब्दुल रहमान की है

वे तब पाकिस्तान में शरणार्थियों की सहायता करने वाले एक कार्यकर्ता थे.

उनके दो बच्चों को लेकर चल रहे विवाद की वजह से उनके परिवार की शिकायत पर उन्हें गिरफ़्तार किया गया.

धर्मांतरण के इस तरह के मामले में ये अफ़ग़ानिस्तान का पहला मुक़दमा है और इसे लेकर उदारवादी और कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं.

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान की सरकार के पतन को चार साल बीत चुके हैं लेकिन न्यायालयों में अभी भी कट्टरपंथी न्यायाधीशों का दबदबा है.

और दूसरी अहम बात ये है कि अफ़ग़ानिस्तान का क़ानून शरिया पर ही आधारित है.

ख़बरें हैं कि अब्दुल रहमान ने एक बार और धर्मांतरण से इंकार करते हुए कहा है कि वे आस्थावादी हैं और ईश्वर पर विश्वास करते हैं.

वॉशिंगटन के बीबीसी संवादताता जोनाथन बील ने कहा है कि यह मामला अमरीका के लिए अपमानजनक सा मामला है जो अफ़ग़ानिस्तान में प्रजातंत्र और आज़ादी क़ायम करने में लगा हुआ है.

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