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रविवार, 12 फ़रवरी, 2006 को 05:02 GMT तक के समाचार
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सीधे प्रसारण से तनाव और उत्तेजना

संसद
शोध में कहा गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों के लोग संसद की कार्यावाही का सीधा प्रसारण देखना चाहते हैं
एक शोध से पता चला है कि भारत में संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण ख़ुश कम दर्शकों को करता है लेकिन तनाव ज़्यादा लोगों में बढ़ाता है और कई बार वे उत्तेजित हो जाते हैं.

संसद की कार्यवाही के सीधे प्रसारण पर पहली बार किए गए इस शोध से पता चलता है कि बहुत से सांसदों के मन में भी धारणा है कि संसद में शोरशराबा करने से उनकी छवि उभरती है.

शोध के मुताबिक़ दर्शक या भारतीय मतदाता अपने सांसदों से शालीन आचरण की उम्मीद करते हैं वहीं राजनेता भी मानते हैं कि संसद गरिमा बनाई रखनी चाहिए.

दो वर्षों तक पूरे देश के विभिन्न हिस्सों से आंकड़े जुटाकर ये शोध किया है वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश दुबे ने. इस शोध के लिए उन्हें लोकसभा की ओर से फ़ैलोशिप दी गई थी.

उनका यह शोध जल्दी ही प्रकाशित भी होने जा रहा है.

ख़ुशी-तनाव

बीबीसी से हुई चर्चा में प्रकाश दुबे ने शोध के बारे में बताया, "संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखने वालों में से 75 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे किसी न किसी सांसद के किसी न किसी आचरण से क्षुब्ध हैं."

 संसद में साहेबान ग़ुस्से में बोलते हैं तो उनकी गर्दन फूल जाती है और ऐसे में मुझे कभी-कभी लगता है कि टीवी ही फोड़ डालूँ
कलीमुल्ला, एक दर्शक

उनका कहना है कि आंकड़ों के अनुसार सिर्फ़ 17 प्रतिशत लोग ही ऐसे थे जिन्हें संसद की कार्यवाही देखकर कोई ख़ुशी होती है लेकिन इसे देखकर तनावग्रस्त हो जाने वाले लोगों की संख्या 42 प्रतिशत थी.

शोध के अनुसार 34 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे संसद की कार्यवाही देखते हुए उत्तेजित हो जाते हैं.

मलीहाबाद के कलीमुल्ला ऐसे ही एक दर्शक हैं और वे कहते हैं, "संसद में साहेबान ग़ुस्से में बोलते हैं तो उनकी गर्दन फूल जाती है और ऐसे में मुझे कभी-कभी लगता है कि टीवी ही फोड़ डालूँ."

भिंड में डकैत के रुप में आत्मसमर्पण कर आम आदमी सा जीवन बिता रहे बाबू खाँ सीधे प्रसारण पर कहते हैं, "मुझे कई बार नींद आने लगती है और कई बार मुँह चरपराने लगता है."

छवि और राय

संसद का सीधा प्रसारण देखने वालों की आमतौर पर प्रतिक्रिया यह रही है कि संसद सदस्य देश की 100 करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्हें संसद में बेहतर आचरण करना चाहिए.

सोमनाथ चटर्जी
सोमनाथ चटर्जी की लोकसभा अध्यक्ष बनने के पहले राय थी कि सीधे प्रसारण से स्थिति नहीं सुधर सकती लेकिन प्रसारण होना चाहिए

शोध में शामिल एक दर्शक ने कहा, "वोट माँगते वक़्त बहुत मीठा बोलने वाले सांसदों को कुश्ती लड़ने के लिए तो संसद में नहीं भेजा जाता."

दर्शकों की राय है कि चुनाव में चाहे जो जैसे जीता हो लेकिन जीतने के बाद ज़िम्मेदारी आनी चाहिए.

लेकिन शोध के लिए हुए सर्वेक्षण में भाग लेने वालों बहुत से सांसदों के मन में अवधारणा है कि उनके प्रदर्शन से दर्शकों में निराशा नहीं है और संसद में उत्तेजना, तोड़फोड़ और शोरशराबे की घटनाओं से उनकी छवि उभरती है.

वे मानते हैं कि आमतौर पर 'संसद नहीं चलने दी' और 'मंत्री को दुरुस्त कर दिया' जैसी घटनाएँ ही दर्शकों को या उनके मतदाताओं को ज़्यादा याद रहती हैं.

 हम जैसे लोगों को जीवन निर्वाह करने के लिए काम करना होता है और ऐसी स्थिति में हम इस निरर्थकता में समय नष्ट नहीं कर सकते
अदूर गोपालकृष्णन

लेकिन सुपरिचित फ़िल्मकार अदूर गोपालकृष्णन तो इस प्रसारण को देखते ही नहीं और इसका कारण पूछने पर उन्होंने कहा, "हम जैसे लोगों को जीवन निर्वाह करने के लिए काम करना होता है और ऐसी स्थिति में हम इस निरर्थकता में समय नष्ट नहीं कर सकते."

हालांकि उन्होंने कहा कि जब भी वे इसे देखते हैं उन्हें 'हताशा होती है और अफ़सोस होता है' क्योंकि उन्होंने कई बार सांसदों को अपनी जगह से उठकर अध्यक्ष की आसंदी की ओर भागते देखा है.

अब लोकसभा अध्यक्ष बनकर सीधे प्रसारण के लिए दो अलग चैनल शुरु करने वाले सोमनाथ चटर्जी ने शोध के दौरान अपने साक्षात्कार में कहा था, "जिस तरह के लोगों को टिकट दी जा रही है उससे संसद के सीधे प्रसारण से कोई सुधार नहीं होगा लेकिन मै सीधे प्रसारण का पक्षधर हूँ क्योंकि कम से कम लोगों को तो पता चले कि उनका प्रतिनिधि संसद में क्या कर रहा है."

उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक तोड़फोड़ के दौरान विधानसभा अध्यक्ष रहे केसरीनाथ त्रिपाठी मानते हैं, "मैं सीधे प्रसारण को सही मानता हूँ क्योंकि उस घटना के प्रसारण के बाद ही जनप्रतिनिधियों ने भी महसूस किया कि सदन की गरिमा इससे घटती है."

शोध

तेहरवीं लोकसभा के दौरान किए गए इस शोध के लिए प्रकाश दुबे ने देश भर में तीन हज़ार से अधिक लोगों से साक्षात्कार लिए और उनसे प्रश्नावलियाँ भरवाईं.

प्रकाश दुबे
प्रकाश दुबे इस समय दैनिक भास्कर, नागपुर के प्रधान संपादक हैं

इसमें लोकसभा और विधानसभा के तत्कालीन और पूर्व अध्यक्ष, कला, समाजसेवा, पत्रकारिता तथा अन्य दूसरे क्षेत्रों के महत्वपूर्ण व्यक्ति भी शामिल थे.

प्रकाश दुबे का कहना है कि इस शोध के लिए वे उन इलाक़ों में भी गए जहाँ आमतौर पर जनप्रतिनिधि या तो जाते नहीं या बहुत कम जा पाते हैं. इसमें राजस्थान के सीमावर्ती गाँव मुनाबाव से लेकर मेघालय के अंतिम गाँव डौकी तक कई जगहें थीं.

इस शोध के लिए संसद के दोनों सदनों के तीन सौ से भी अधिक सदस्यों से प्रश्नावली भरवा कर सीधे प्रसारण के बारे में उनकी राय ली.

प्रकाश दुबे कहते हैं, "सांसदों से सही बात जानना कठिन काम था क्योंकि अपनी छवि ठीक रखने के लिए वे सही जानकारी को छिपा भी सकते थे, ऐसे में मैंने सच जानने के लिए एक ही सवाल को कई तरह के प्रश्नावली में रखा जिससे कि सच निकल ही आए."

और वे कहते हैं कि सच तो बाहर आ ही गया.

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