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गुरुवार, 22 दिसंबर, 2005 को 13:15 GMT तक के समाचार
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सूनामी से बचाव का हरा-भरा अभियान

मैंग्रोव
दलदली ज़मीन पर खारे पानी में उगे जंगल ने सुनामी लहरों से किल्लई पिचावरम को बचाया था
सुनामी की उफनती लहरें पिछले साल कई तटवर्ती इलाक़ों में बर्बादी फैलाकर चली गईं लेकिन कुछ इलाक़े ऐसे थे जहाँ कुछ भी नुक़सान नहीं हुआ.

तब शायद तमिलनाडु के किल्लई पिचावरम ही नहीं, पूरी दुनिया की समझ में आया कि प्रकृति सिर्फ़ विनाश ही नहीं करती बल्कि बचाव के रास्ते भी सुझाती है.

किल्लई पिचावरम में दलदली ज़मीन पर खारे पानी में उगे जंगल(मैंग्रोव)थे जिन्होंने सुनामी लहरों को ढाल की तरह रोक लिया और उसके पीछे बसे गाँव सुरक्षित रहे.

तमिलनाडु के चिंदबरम शहर के पास प्राकृतिक रूप से उगे इस मैंग्रोव ने अब 'क्रीड’ नाम के एक स्थानीय स्वयंसेवी संगठन को प्रेरित किया है कि तटवर्ती इलाक़ों में गाँवों और समुद्र के बीच ऐसी ही ढाल बनाई जाए. मैंग्रोव को ही तमिल में पिचावरम कहा जाता है.

क्रीड के सचिव वी नडानसभापति कहते हैं,"मेरा घर किल्लई पिचावरम के पास ही है, मैंने जब बाक़ी जगहों पर हुई तबाही देखी तो मुझे समझ में आया कि मैंग्रोव से बेहतर सुनामी से बचाव का कोई रास्ता नहीं है इसलिए हमने यह अभियान शुरू किया है."

सूनामी से तबाह हुए कडलूर ज़िले में राहत के प्रभारी एस शणमुगम कहते हैं,"हमने देर से सही, लेकिन सबक़ सीखा है, हम पूरे तटवर्ती इलाक़े में बायोशील्डिंग करने वाले ग़ैर सरकारी संगठनों को पूरी सहायता और समर्थन देंगे."

योजना

बायोशील्डिंग के लिए क्रीड को अग्रणी कल्याणकारी संस्था केयर इंडिया से सहयोग मिल रहा है. इंटरनेशनल ट्री फाउंडेशन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस परियोजना में काफ़ी दिलचस्पी दिखाई है.

 हमने देर से सही, लेकिन सबक़ सीखा है, हम पूरे तटवर्ती इलाक़े में बायोशील्डिंग करने वाले ग़ैर सरकारी संगठनों को पूरी सहायता देंगे
एस शणमुगम, राहत प्रभारी, कडलूर

केयर इंडिया के सूनामी राहत प्रभारी मोजेज सैमुएल कहते हैं कि शुरूआत में लगभग तीन करोड़ रूपए की लागत से 52 गाँवों को सुनामी से सुरक्षा मिल सकेगी.

लगभग 75 हेक्टेयर तटवर्ती भूमि पर पौधे लगाए जाएंगे,लगभग तीन वर्षों में ये पौधे पेड़ बन जाएँगे. वन विभाग की मदद से स्वयंसेवी संगठन और स्थानीय निवासी इन जंगलों की निगरानी करेंगे.

इस योजना के विशेषज्ञ सलाहकार के सुंदरम बताते हैं कि यह काम आसान नहीं है क्योंकि खारे पानी में कुछ ख़ास क़िस्म के पौधे उगते हैं. इस तरह की दलदली ज़मीन पर पौधे लगाने के लिए गड्ढे खोदना बहुत टेढ़ा काम है.

सुंदरम कहते हैं,"मैंग्रोव के उगने के लिए ज़रूरी है कि उसे खारे और मीठे पानी का मिश्रण मिले, हम अवीसिनिया मरेना और ब्रुगेरा जैसे तेज़ी से उगने वाले पौधे लगा रहे हैं."

और भी फ़ायदे

इरूला जनजाति
इरूला जनजाति के लोग मैंग्रोव लगाने की योजना से काफ़ी ख़ुश हैं

केयर इंडिया के सैमुएल कहते हैं कि "जहाँ बिना खारे पानी के मैंग्रोव नहीं हो सकते वहाँ भी हम कैसुरेना,नारियल और खजूर के पेड़ लगाएँगे.उनसे भी काफ़ी मदद मिलती है."

वे बताते हैं कि पेड़ खारे पानी को खेतों में घुसने से रोकते हैं, अगर खारा पानी खेतों में घुस जाए तो किसान फ़सल नहीं उगा पाते.

क्रीड का मानना है कि इस पूरी परियोजना से अगर किसी को सबसे अधिक फ़ायदा पहुँचेगा तो वह इरूला जनजाति को. इरूला जनजाति के लोग दलदली ज़मीन पर मछली पकड़ने में माहिर होते हैं और अब उन्हें ही वनरोपण के काम में लगाया जा रहा है.

इरूला जनजाति के लोग इस योजना से काफ़ी ख़ुश हैं और उनकी पंचायत ने इस काम में ग़ैरसरकारी संगठनों की पूरी मदद करने का वादा किया है.

हर कोई यही चाहता है कि फिर कोई सुनामी न आए लेकिन उससे बचने के उपायों के तहत हरियाली आ जाए तो इससे अच्छी बात क्या होगी.

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