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मृतकों के परिजनों की ऐसी पीड़ा ! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली में शनिवार की शाम हुए बम विस्फ़ोटों में मारे गए लोगों के परिजनों को इस सदमे से उबरने में अभी काफ़ी वक़्त लगेगा पर अपने परिचितों के शव लेने के लिए उन्हें जो तकलीफ़ झेलनी पड़ रही है, उसे शायद वे ज़िंदगी भर न भूल पाएँ. लोग अपने परिचितों के शव लेने के लिए पूरी तैयारी के साथ अस्पताल में मौजूद थे पर घटना के तीसरे दिन भी कई लोगों को शव नहीं दिए गए है. पुलिस डॉक्टरों को दोष दे रही थी तो डॉक्टर पुलिस को. अपनों के शव लेने के लिए लोगों का यह इंतज़ार दिल दहलाने वाला है. लोग आँखों में आँसू और अपनों की लाश मिलने की आस लिए पिछले तीन दिनों से यहाँ दिन-रात बैठे हैं पर प्रशासन की कार्रवाई की गति में अपेक्षित तेज़ी नहीं है और इसके चलते लोगों में ख़ासा रोष व्याप्त है. कब मिलेगा शव बिहार के नवादा ज़िले के सुल्तानपुर गाँव का 22 वर्षीय सुरेंद्र सरोजनीनगर में एक दुकान पर काम करता था जो इस हादसे में मारा गया. उसकी शिनाख्त परिवार के लोगों ने रविवार की सुबह ही कर ली थी पर शव अभी तक परिजनों को नहीं सौंपा गया है. शव लेने के लिए सुरेंद्र के गाँव से घर के लोग, कोलकाता के रिश्तेदार और तमाम दोस्त दिल्ली पहुँच चुके हैं, इस आस में कि दीपावली के पहले वे उसके शव का अंतिम संस्कार कर सकेंगे पर आस आस ही बनकर रह गई है और लाश मिलती नज़र नहीं आ रही है. इस बीच बुरी तरह से जल चुके शव अब ख़राब भी होने लगे है. हाँ, मगर वीआईपी दौरों के वक्त चुस्त नज़र आनेवाला प्रशासन या अस्पताल प्रबंधन इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं है. सोमवार दोपहर जब हम किसी तरह से शवगृह के अंदर जाने में सफल हो सके तो देखा कि वहाँ करीब 12-13 शव अभी तक पड़े हैं. इनमें से 10 शवों की अभी तक कोई शिनाख़्त नहीं हो सकी है जबकि दो बच्चों के शवों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. किसके हैं ये बच्चे यह दुखद स्थिति तब पैदा हो गई जब तीन परिवारों ने इन दोनों बच्चों के शवों पर अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर दी. पहला परिवार दिलबाग सिंह का है. झज्जर के दिलबाग, उनकी पत्नी और दो बच्चे, निखिल और प्रियंका इस हादसे में मारे गए. दिलबाग और उनकी पत्नी के शव तो परिजनों को मिल गए पर बच्चों की शिनाख़्त अभी तक नहीं हो सकी है.
वजह यह है कि दिल्ली के अनुपम गुप्ता कह रहे हैं कि करीब चार साल का यह बच्चा निखिल नहीं, उनका बेटा उत्कर्ष है जबकि असम के अपूर्व शर्मा का दावा है कि करीब आठ साल की बच्ची का शव, दरअसल प्रियंका नहीं, उनकी बेटी मैत्री है. इस हादसे में अनुपम गुप्ता ने अपना बेटा खोया है तो अपूर्व शर्मा ने अपने परिवार के तीन सदस्य. हवाई राहत ग़ौरतलब है कि सरकार ने हादसे के बाद मृतकों की शिनाख़्त के लिए 22 शवों की डीएनए जाँच कराने की बात कही थी पर अभी तक किसी भी शव के डीएनए परीक्षण की कोई ख़बर नहीं मिली है. बच्चों के शवों पर विवाद का जब काफ़ी उलझ गया तो सोमवार की शाम तीनों परिवार दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के उपायुक्त रवींद्र सिंह के पास गए जहाँ उनकी मध्यस्थता में मामले का हल निकालने की कोशिश की गई. ख़ुद को मृतक बच्चों में से एक के पिता बताने वाले, अनुपम गुप्ता ने उपायुक्त के साथ हुई बातचीत के बाद पत्रकारों को बताया कि दीपावाली के चलते बुधवार को ही उन सभी के डीएनए जाँच के नमूने लिए जाएँगे और संयुक्त आयुक्त की मौजूदगी में शवों का सम्मिलित रुप से अंतिम संस्कार किया जाएगा. दो शवों से चार बच्चों को तलाश करने की कोशिश में एक सवाल तो यह है कि बाक़ी के दो बच्चे कहाँ हैं और दूसरा सवाल सरकार की उस दावेदारी पर भी है जिसमें मृतकों के परिजनों को हर संभव मदद के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें परिजनों को ढूँढ़ रही थी नम आँखें...29 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस मैंने देखे जले हुए शव, मैंने देखे.....29 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस दीपावली के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था31 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस धमाकों से दहल गई दिल्ली30 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस दिल्ली धमाकों की दुनिया भर में निंदा30 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'सरकार के पास अहम जानकारी है'30 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस कश्मीरी संगठन ने 'ज़िम्मेवारी ली'30 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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