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सोमवार, 26 सितंबर, 2005 को 09:20 GMT तक के समाचार
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क़ैदियों को सिखा रहे हैं पूजा-पाठ

भोपाल सेंट्रल जेल में क़ैदी
क़ैदियों को विधिवत प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई है
ये एक अलग तरह का सफ़र है जिसमें अपराध की दुनिया से जुड़े लोग एक विपरीत धारा से जुड़ जाएँगे और पूजा-पाठ करवाते हुए नज़र आएँगे.

यह असंभव भी नहीं क्योंकि भोपाल की सेंट्रल जेल से निकलने वाले क़ैदी अब पंडिताई में भी परांगत होंगे.

देश के पहले आईएसओ प्रमाणित भोपाल जेल में क़ैदी इन दिनों पंडित बनने का प्रशिक्षण ले रहे हैं.

बंदियों को 'संस्कारवान' बनाकर उनकी मनोवृत्ति में बदलाव के लिए भोपाल जेल में कुछ ख़ास कदम उठाए गए हैं.

आजकल बंदियों को पंडिताई सिखाने के साथ-साथ संगीत और कला की विधाएं भी सिखाई जा रही है.

भोपाल के इस जेल में 90 प्रतिशत बंदी हिंदू धर्म में विश्वास रखते हैं और उन्हें धर्म के मुताबिक 'संस्कारवान' बनाने का जिम्मा जेल प्रशासन ने उठाया है.

इसी के तहत 30 क़ैदी पुरोहित बनने के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं.

गायत्री शक्तिपीठ के शंकर पाटीदार उन्हें प्रार्थना, आरती, पूजा-पाठ, कर्मकांड, सोलह संस्कारों का विधि विधान, मुहूर्त निकालने की विधि सहित ज्योतिष का भी ज्ञान करा रहे हैं.

जेल में पंडिताई का प्रशिक्षण ले रहे लक्ष्मी नारायण शर्मा का मानते हैं, "यहाँ पर सीखने वाली चीजें मुझे एक बेहतर इंसान बनने में मददगार साबित होगी, वहीं इसके ज़रिए मैं जिंदगी भी सुधार सकूँगा."

हालांकि कैदियों पर लोगों का विश्वास कम ही है, इसके बावजूद ये माना जा रहा है कि वक़्त के साथ इन लोगों को एक नई जिंदगी मिल सकेगी.

 एक बार जेल से छूटने के बाद ये क़ैदी मंदिर में या घरों पर पूजा पाठ संपन्न कर सकते हैं. आख़िर में इन कैदियों को लोगों के अंतिम संस्कार में की जाने वाली क्रियाओं के बारे में भी बताया जाएगा
प्रशिक्षक श्याम शर्मा

एक और क़ैदी कमल किशोर का भी कहना है कि इस प्रशिक्षण के बाद उन्हें मिलने वाली ऊर्जा उनकी जिंदगी में बदलाव लाने में सहायक होगी.

गायत्री शक्तिपीठ के श्याम शर्मा का कहना है, "एक बार जेल से छूटने के बाद ये क़ैदी मंदिर में या घरों पर पूजा पाठ संपन्न कर सकते हैं. आख़िर में इन कैदियों को लोगों के अंतिम संस्कार में की जाने वाली क्रियाओं के बारे में भी बताया जाएगा."

जेल अधीक्षक गोपाल ताम्रकार का मानना है कि इससे जेल से छूटने पर क़ैदी को रोज़गार के अवसर भी मिलेंगे.

सच्चाई

मगर इन सब के बीच इन कैदियों को ये बात अच्छी तरह मालूम है कि एक बार जेल से बाहर आने के बाद लोगों का विश्वास इस काम के लिए जीत पाना आसान नहीं होगा.

भोपाल सेंट्रल जेल में क़ैदी
क़ैदियों को संगीत की भी शिक्षा दी जा रही है

उम्रक़ैद की सज़ा काट रहे कमल तिवारी मानते हैं कि कम ही लोग उन्हें पुरोहित के तौर पर देखना चाहेंगे, ख़ासकर तब जबकि उन्होंने जिंदगी का लंबा अरसा जेल में गुजारा हो.

मगर वो कहते हैं कि वो अपनी जिंदगी सुधारने की एक कोशिश ज़रूर करेंगे.

जेल मंत्री ढाल सिंह बिसेन का कहना है, "हम इन लोगों को समाज का हिस्सा बनाना चाहते हैं. हम समझते हैं कि ये प्रशिक्षण उन्हें समाज में एक अलग ही स्थान दिलाएगा."

वे कहते हैं कि भोपाल की इस जेल में कैदियों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. ताकि जेल से रिहा होने के बाद वो अपना कारोबार स्थापित कर सकें.

जेल में कैदियों को संगीत और ध्यान के जरिए तनाव मुक्त रहने के गुर भी सिखाए जा रहे हैं. माँ सरस्वती कला और संगीत विद्यालय के रूप में बंदियों को मंच उपलब्ध करवाया गया है, जहाँ क़ैदी संगीत की विभिन्न विधाओं से रूबरू हो रहे हैं.

इसके पहले जेल महानिदेशक जीके सिन्हा की पहल पर दस दिन का विपश्यना ध्यान शिविर भी कैदियों के लिए हो चुका है.

मगर इन सबके बीच सरकार पर जेलों के भगवाकरण का आरोप भी लग रहा है.

जेल मंत्री ढाल सिंह अपने बचाव में कहते हैं कि वो दूसरे मज़हब के कैदियों को भी इस तरह का प्रशिक्षण दिलाना चाहते हैं. वो मानते हैं कि ये बदलाव की शुरूआत है.

इन क़ैदियों को पुजारियों के रुप में समाज किस तरह स्वीकार करता है यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा.

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