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यह कमज़ोर होते सेनापति के संकेत हैं

आडवाणी
आडवाणी की सत्ता कमज़ोर होती नज़र आ रही है
पिछले कुछ दिनों से चल रहे नाटक का पटाक्षेप तो हो गया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पारिवारिक मित्र मदनलाल खुराना ने अपने उसी अध्यक्ष से माफी माँग ली जिसके नेतृत्व पर उन्होंने शक की उंगली उठाई थी.

उन्होंने यहाँ तक यह दिया था कि आडवाणी के नेतृत्व में काम करने में परेशानी होगी. और उनके उस अध्यक्ष ने खुराना को माफ़ कर दिया बल्कि अनुशासन के नाम पर पार्टी से निकाले गए खुराना के पुनर्वापसी का रास्ता भी साफ़ कर दिया.

यह एक कमज़ोर होते सेनापति की त्रासदी है.

आज अगर मदन लाल खुराना की वापसी संभव है तो कल गोविंदाचार्य की वापसी में क्या परेशानी है? कल अगर कल्याण सिंह की वापसी संभव हो पाई थी तो आज बलराज मधोक की वापसी क्यों नहीं हो सकती?

भारतीय जनता पार्टी को नेतृत्व से जुड़े इन सवालों का उत्तर भी तुरंत ढूंढ़ना होगा. भारतीय जनता पार्टी में वैचारिक भ्रम और नेतृत्व के संकट का यह ताज़ा उदाहरण है.

अगर वाजपेयी का खुराना समर्थक बयान नहीं आता तो खुराना पार्टी से बाहर होते क्योंकि पार्टी नियमों के अनुसार अनुशासन समिति की संस्तुति पर पार्टी के शीर्ष पदाधिकारियों की मुहर भी लग चुकी थी.

लेकिन वाजपेयी ने कांटा फंसा दिया जो दो तरफ चुभ रहा था. एक आडवाणी की पीठ में और दूसरा अनुशासन समिति की उन उंगलियों में जो निष्कासन का मसौदा तैयार कर रही थी.

पार्टी को बेशक इस ड्रामेबाजी से कुछ हासिल नहीं हुआ हो, लेकिन वाजपेयी ने इससे दो संधान किए. एक तो आडवाणी पर अपना वर्चस्व साबित किया और दूसरा पारिवारिक मित्र को अपमान का दंश भोगने से बचा लिया.

एक सोची-समझी रणनीति के तहत वाजपेयी का लखनऊ से बयान आया कि आडवाणी से कोई विरोध नहीं है और फिर मदनलाल खुराना का आडवाणी से माफ़ी मांगना.

वाजपेयी की चली

फिर आनन-फानन में निष्कासन वापस लेने की प्रक्रिया का आरंभ होना संभवतः यह स्पष्ट करता है कि इस पूरे प्रकरण में पहले की भाँति एक बार फिर वाजपेयी की चली.

आडवाणी
इस संघर्ष में आडवाणी पर वाजपेयी की जीत मानी जा रही है

लेकिन इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की वैधता पर एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लग गया. गुटबाजी की त्रासदी झेलती भाजपा का कद और बौना हो गया.

नेतृत्व पर आए इस संकट का पाप दोनों नेताओं को भोगना होगा, जिन्होंने पिछले 25 वर्षों के दौरान पार्टी को चेरी बनाकर रखा और किसी दूसरे नेता को इस काबिल नहीं बनाया कि वह अगली पंक्ति में खड़ा हो सके.

हवा-हवाई बातें और हैं लेकिन पार्टी की ज़मीनी हक़ीकत से जुड़ना कुछ और बात है.

भारतीय जनता पार्टी के इस वैचारिक भ्रम के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भ्रमित होना भी है, जिसने सत्ता से बाहर होते हुए भी हिंदुत्व का राग अलापा.

लेकिन परिवार की राजनीतिक पार्टी भाजपा के सत्तानशीन होते ही हिंदुत्व भूलकर राष्ट्रवाद का झंडा उठा लिया.

अब भाजपा सत्ता से बाहर है और संघ एक बार फिर हिंदुत्व को केंद्र में रखकर हिंदू जनमानस को रिझाने का काम करना चाहता है.

नेतृत्व के इस संकट के पीछे भारतीय जनता पार्टी पर सत्ता में रहने के दौरान अतिरिक्त मोटापा चढ़ना भी है.

मात्र छह वर्षों के शासनकाल में भाजपा पर इतनी चर्बी चढ़ गई कि पार्टी उसके बोझ तले तब गई.

अटल-आडवाणी के पार्टी पर अखंड राज की परिणति है भाजपा का यह नेतृत्व संकट.

फिलहाल पार्टी को अध्यक्ष पद पर लोकप्रिय चेहरा नहीं, संगठन के लिए समर्पित व्यक्ति चाहिए जो अपनी लोकप्रियता का नाजायज फ़ायदा नहीं उठाए.

पार्टी में चरम पर पहुंच गई गुटबाजी भी तभी ख़त्म होगी. आडवाणी से ग़लती यह हो गई कि उन्होंने कैरियर के अंत में पार्टी का अध्यक्ष पद फिर से स्वीकार कर लिया.

वे शायद यह भूल गए कि बुजुर्गों को घुड़सवारी नहीं शोभा देती.

वे दिशा-निर्देश देने की स्थिति में रहें तो वह उत्तम स्थिति होती है. संभवतः यही कारण रहा कि बगैर अध्यक्षी के आडवाणी में जो नैतिक सत्ता थी, वह अध्यक्षी मिलने के कुछ दिनों के अंदर ही धूल-धूसरित होने लगी.

पाकिस्तान में दिए बयान के बाद का उफ़ान और खुराना के निष्कासन पर मची हायतौबा कमज़ोर होते सेनापति के संकेत हैं. वैसे वाजपेयी आडवाणी पर एक बार फिर भारी पड़े.

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